पूरा कुंडली मिलान लेख
प्रश्न यह उठता है कि क्या कुण्डली मेलापक (गुणा मिलान) सबके लिए आवश्यक है? क्या जो लोग कुण्डली मेलापक (गुणा मिलान) नहीं करवाते वे सुखी तथा समृद्ध नहीं होते? विश्व में कई जाति एवं धर्म में मेलापक नहीं करते। तो क्या यह परिवार सुखी नहीं? ऐसी बात नहीं। सुख और समृद्धि तो वहां पर भी है।
दवाई की तो उसको ज्यादा जरूरत होती है जो रोगी होता है, अन्य व्यक्ति तो केवल प्रकृति के नियमों का पालन करता हुआ निरोग रह सकता है। मौसम के अनुसार खान-पान तथा वस्त्र धारण करने से भी व्यक्ति निरोग रह सकता है। परन्तु जो रोगी है उसके लिए तो औषध आवश्यक हो जाती है।
के. पी. ज्योतिष द्वारा भावी जीवन साथी (वर-वधु) की सम्पूर्ण जानकारी — कर्म, गुण, स्वभाव आदि — के साथ-साथ उसके संयोग से उत्पन्न होने वाली स्थितियों तथा प्रभावों का भी सही मूल्यांकन किया जा सकता है। कुण्डली मेलापक (गुणा मिलान) करते समय आगे लिखे गये नियमों का पालन कर लेना श्रेयस्कर रहता है।
परम्परागत ज्योतिष के अनुसार वर-वधु की कुण्डली मेलापक (गुणा मिलान) में केवल 36 गुणों को ही प्रधानता दी जाती है। और व्यक्ति कुण्डली मेलापक (गुणा मिलान) के आधार पर वैवाहिक कार्य सम्पन्न कर लेते हैं, जबकि अकेला गुण-मिलान ही दम्पति के भावी जीवन को प्रभावित नहीं करता और ना ही इसे जन्मपत्रियों का मेलापक (गुणा मिलान) किसी भी दशा में कहा जा सकता है। जन्म-पत्रियों के मिलान से संतुष्ट होकर विवाह करने पर भी उपरोक्त अशोभनीय घटनाओं का होना चिन्ता का विषय है। चिन्ता दाम्पत्य जीवन नष्ट होने की तो है ही, परन्तु चिन्ता इस बात की भी है कि इस प्रकार ज्योतिष जैसे पुनीत विज्ञान पर से लोगों का विश्वास उठ सकता है। क्योंकि सुखद दाम्पत्य जीवन के लिए दस विशेष बिन्दुओं पर विचार करना अति आवश्यक है।
जबकि उपरोक्त इन दस विशेष बिन्दुओं का प्रचलन में नहीं होने के कारण वर-वधु कुण्डली मेलापक (गुणा मिलान) परम्परागत नहीं होता। यही कारण है कि अधिक से अधिक गुण मिल जाने पर भी गृहस्थ जीवन सफल नहीं होता और विवाह के कुछ ही समय पश्चात् अनेक युगलों का दाम्पत्य जीवन नष्ट हो जाता है। दिन-रात की कलह के कारण जीवन नरक बन जाता है। विपरीत परिस्थितियों की चरम सीमा जीवन साथी द्वारा तलाक, न्यायालयिक मुकदमा या हत्या का कारण भी बन जाती है, तो कभी जीवनसाथी आत्महत्या करने पर विवश हो जाता है। कुछ युगल ऐसे भी होते हैं जो नरकतुल्य दाम्पत्य जीवन भोगते हुए भी अन्तिम निर्णय (विवाद, तलाक, हत्या या आत्महत्या) नहीं कर पाते और जीवन रूपी गाड़ी के पहियों में तेल (स्नेह) एवं ग्रीस (मधुरता) दिए बिना ही गाड़ी खींचते रहते हैं। इस प्रकार सर्वप्रथम वर-वधु की कुण्डलियों में उपरोक्त दस बिन्दुओं पर विचार करने के बाद ही कुण्डली मेलापक (गुणा मिलान) करना चाहिए।
यदि उपरोक्त बिन्दु संतोषजनक हों और मेलापक में गुण न के बराबर आ रहे हों तो भी चिंता की कोई बात नहीं, विवाह करना उत्तम रहेगा। और यह भी जरूरी नहीं कि मंगली वधु का विवाह मंगली वर के साथ हो। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं कि मंगली वधु का विवाह मंगली वर से हुआ है, फिर भी दाम्पत्य जीवन अशांत बन गया।
| शीर्ष | अर्थ |
|---|---|
| 1- आयुर्दाय | 6- विवाद |
| 2- स्वास्थ्य | 7- न्यायालय सम्बन्धित |
| 3- शिक्षा | 8- परिवारिक सम्बन्ध |
| 4- आपसी तालमेल | 9- सच्चरित्रता |
| 5- संतान | 10- आर्थिक स्थिति |
नोट: माता/पिता होने के नाते तथा उपरोक्त दस बिन्दुओं से पूर्ण संतुष्ट नहीं होने के उपरान्त भी अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह तो करना ही है, परन्तु यह तभी सम्भव है जब माता/पिता और पुत्र-पुत्रियाँ मन और बुद्धि से विचार करें, क्योंकि दोनों परिवारों की ही आपसी समझदारी विवाह सम्बन्धों को सफल बना सकती है।
