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ज्योतिष अर्थात अध्यात्म

कुछ बातें जान लेनी जरूरी हैं। सबसे पहले तो यह बात जान लेनी जरूरी है कि वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य से समस्त सौर परिवार का—मंगल का, बृहस्पति का, चंद्र का, पृथ्वी का जन्म हुआ है। ये सब सूर्य के ही अंग हैं। फिर पृथ्वी पर जीवन का जन्म हुआ—पौधों से लेकर मनुष्य तक। मनुष्य पृथ्वी का अंग है, पृथ्वी सूरज का अंग है। अगर हम इसे ऐसा समझें—एक मां है, उसकी एक बेटी है, और उसकी एक बेटी है—उन तीनों के शरीर का निर्माण एक ही तरह के सेल्स से, एक ही तरह के कोष्ठों से होता है।

और वैज्ञानिक एक शब्द का प्रयोग करते हैं 'एम्पैथी' (Empathy) का, समानुभूति का। जो चीजें एक से ही पैदा होती हैं, जैसे सूर्य से पृथ्वी पैदा होती है, पृथ्वी से हम सबके शरीर निर्मित होते हैं। थोड़ी ही दूर फासले पर सूरज हमारा महापिता है। सूर्य पर जो घटित होता है वह हमारे रोम-रोम में स्पंदित होता है। क्योंकि हमारा रोम-रोम भी सूर्य से ही निर्मित है। सूर्य इतना दूर दिखाई पड़ता है, इतना दूर नहीं है। हमारे रक्त के एक-एक कण में और हड्डी के एक-एक टुकड़े में सूर्य के ही अणुओं का वास है। हम सूर्य के ही टुकड़े हैं। और यदि सूर्य से हम प्रभावित होते हैं, इसमें कुछ आश्चर्य नहीं है—एम्पैथी है, समानुभूति है।

समानुभूति (Empathy) का प्रयोग

समानुभूति को भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है, जिससे ज्योतिष के एक आयाम में प्रवेश हो सकेगा। प्रयोग किए जा सकते हैं, और इस तरह के बहुत से प्रयोग पिछले पचास वर्षों में किए गए हैं। एक ही अंडे से जन्मे जुड़वां बच्चों को दो कमरों में बंद कर दिया गया। फिर दोनों कमरों में एक साथ घंटी बजायी गयी और दोनों बच्चों को कहा गया कि उनको जो पहला विचार ख्याल आता है वह उसे कागज पर बना लें। या जो पहला चित्र उनके दिमाग में आता हो तो उसे कागज पर बना लें। बड़ी हैरानी की बात है कि अगर बीस चित्र बनवाए गए हैं दोनों बच्चों से तो उनमें नब्बे प्रतिशत दोनों बच्चों के चित्र एक जैसे हैं! उनके मन में जो पहली विचारधारा पैदा होती है, जो पहला शब्द बनता है या जो पहला चित्र बनता है, ठीक उसके ही करीब वैसा ही विचार जुड़वां बच्चे के भीतर भी बनता और निर्मित होता है।

"इसे वैज्ञानिक कहते हैं—एम्पैथी (Empathy), समानुभूति। इन दोनों के बीच एक समानता है कि ये एक से प्रतिध्वनित होते हैं। इन दोनों के भीतर अनजाने मार्गों से जैसे कोई जोड़ है, कोई संवाद है, कोई कम्युनिकेशन है।"

सूर्य और पृथ्वी के बीच भी ऐसा ही कम्युनिकेशन, ऐसा ही संवाद सेतु है। ऐसा ही संबंध है। प्रतिपल, सूर्य, पृथ्वी, और मनुष्य—उन तीनों के बीच निरंतर संवाद है, एक निरंतर डायलॉग है। लेकिन वह जो संवाद है, डायलॉग है वह बहुत गुह्य है और बहुत आंतरिक है और बहुत सूक्ष्म है। उसके संबंध में थोड़ी सी बातें समझेंगे तो खयाल में आएगा।

वृक्षों के वर्तुल और सौर-चक्र

अमरीका में एक रिसर्च सेंटर है—ट्री रिंग रिसर्च सेंटर। वृक्षों में, जो वृक्ष आप काटें तो वृक्ष के तने में आपको बहुत से रिंग्स (Rings), बहुत से वर्तुल दिखाई पड़ेंगे। फर्नीचर पर जो सौंदर्य मालूम पड़ता है वह उन्ही वर्तुलों के कारण है। पचास वर्ष से यह रिसर्च केंद्र, वृक्षों में जो वर्तुल बनते हैं, चक्र बनते हैं, उन पर ही पूरा काम कर रहा है। प्रो. डगलस अब उसके डायरेक्टर हैं, जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा वृक्षों में जो वर्तुल बनते हैं, उन पर ही व्यय किया है। बहुत से तथ्य हाथ लगे हैं। पहला तथ्य तो सभी को साधारणतः ज्ञात है कि वृक्ष की उम्र उसमें बने हुए रिंग्स के द्वारा जानी जा सकती है। क्योंकि प्रतिवर्ष एक रिंग वृक्ष में निर्मित होता है... वृक्ष की कितनी उम्र है, उसके भीतर कितने रिंग बने हैं, इससे तय हो जाता है। अगर पचास साल पुराना है, उसने पचास पतझड़ देखे हैं तो पचास रिंग उसके तने में निर्मित हो जाते हैं। और हैरानी की बात यह है कि इन तनों पर जो रिंग निर्मित होते हैं वह मौसम की भी खबर देते हैं।

अगर मौसम बहुत गर्म और गीला रहा हो तो जो रिंग है वह चौड़ा निर्मित होता है। अगर मौसम बहुत सर्द और सूखा रहा हो तो जो रिंग है वह बहुत संकरा निर्मित होता है। हजारों साल पुरानी लकड़ी को काटकर पता लगाया जा सकता है कि उस वर्ष जब यह रिंग बना था तो मौसम कैसा था। बहुत वर्षा हुई थी या नहीं हुई थी। सूखा पड़ा था या नहीं पड़ा था। अगर बुद्ध ने कहा है कि इस वर्ष बहुत वर्षा हुई, तो जिस बोधिवृक्ष के नीचे वह बैठे थे वह भी खबर देगा कि वर्षा हुई कि नहीं हुई। बुद्ध से भूल-चूक हो जाए, वह जो वृक्ष है, बोधिवृक्ष उससे भूल-चूक नहीं होती। उसका रिंग बड़ा होगा या छोटा होगा।

डगलस इन वर्तुलों की खोज करते-करते एक ऐसी जगह पहुंच गया जिसकी उसे कल्पना भी नहीं थी। उसने अनुभव किया कि प्रत्येक ग्यारहवें वर्ष पर रिंग जितना बड़ा होता है, उतना फिर कभी बड़ा नहीं होता है। और वह ग्यारह वर्ष वही है जब सूर्य पर सर्वाधिक गतिविधि होती है। हर ग्यारहवें वर्ष पर सूरज में एक रिदम (Rhythm), एक लयबद्धता है। हर ग्यारह वर्ष में सूरज बहुत सक्रिय हो जाता है। उस पर रेडियो एक्टिविटी बहुत तीव्र होती है। सारी पृथ्वी पर उस वर्ष सभी वृक्ष मोटा रिंग बनाते हैं। एकाध जगह नहीं, एकाध जगह जंगल में नहीं—सारी पृथ्वी पर सारे वृक्ष रेडियो एक्टिविटी से अपनी रक्षा के लिए मोटा रिंग बनाते हैं। वह जो सूरज पर तीव्र घटना घटती है ऊर्जा की, उससे बचाव के लिए उनको मोटी चमड़ी बनानी पड़ती है, हर ग्यारह वर्ष।

इससे वैज्ञानिकों में एक नया शब्द और नयी बात शुरू हुई। मौसम सब जगह अलग होते हैं। कहीं सर्दी है, कहीं गर्मी है, कहीं वर्षा है, कहीं शीत है। सब जगह मौसम अलग है। इसलिए अब तक कभी पृथ्वी का मौसम 'क्लाइमेट ऑफ दी अर्थ'—ऐसा कोई शब्द प्रयोग नहीं होता था। लेकिन अब डगलस ने इस शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया है। ये सब छोटे-मोटे फर्क तो हैं ही, लेकिन पूरी पृथ्वी पर भी सूरज के कारण एक विशेष मौसम चलता है, जो हम नहीं पकड़ पाते, लेकिन वृक्ष पकड़ते हैं। हर ग्यारहवें वर्ष पर वृक्ष मोटा रिंग बनाते हैं, फिर रिंग छोटे होते जाते हैं। फिर पाँच साल के बाद बड़े होने शुरू होते हैं। फिर ग्यारहवें साल पर जाकर पूरे बड़े हो जाते हैं।

अगर वृक्ष इतने संवेदनशील हैं और सूर्य पर होती हुई किसी भी घटना को इतनी व्यवस्था से अंकित करते हैं, तो क्या आदमी के चित्त में भी कोई पर्त होगी? क्या आदमी के शरीर में भी कोई संवेदन का सूक्ष्म रूप होगा? क्या आदमी भी कोई रिंग और वर्तुल निर्मित करता होगा अपने व्यक्तित्व में? अब तक साफ नहीं हो सका। अभी वैज्ञानिकों को साफ नहीं है कोई बात कि आदमी में भी क्या होता है। लेकिन यह असंभव मालूम होता है कि जब वृक्ष भी सूर्य पर घटती घटनाओं को संवेदित करते हों तो आदमी किसी भांति संवेदित न करता हो। ज्योतिष, जो जगत में कहीं भी घटित होता है वह मनुष्य के चित्त में भी घटित होता है, इसकी ही खोज है।

नब्बे वर्ष का सौर-चक्र और नील नदी का इतिहास

इस पर हम पीछे बात करेंगे कि मनुष्य भी वृक्षों जैसी ही खबरें अपने भीतर लिए चलता है। लेकिन उसे खोलने का ढंग उतना आसान नहीं है जितना वृक्ष को खोलने का ढंग आसान है। वृक्ष को काटकर जितनी सुविधा से हम पता लगा सकते हैं, उतनी सुविधा से आदमी को काटकर पता नहीं लगा सकते। आदमी को काटना सूक्ष्म मामला है और आदमी के पास चित्त है इसलिए आदमी का शरीर उन घटनाओं को नहीं रिकॉर्ड करता, चित्त रिकार्ड करता है। वृक्षों के पास चित्त नहीं है, इसलिए शरीर ही उन घटनाओं को रिकार्ड करता है।

एक और बात इस संबंध में ख्याल में ले लेने जैसी है—जैसा मैंने कहा, ग्यारह वर्ष में सूरज पर तीव्र रेडियो एक्टिविटी, तीव्र वैद्युतिक तूफान चलते हैं। ठीक ऐसा ही एक दूसरा बड़ा रिदम भी पता चलना शुरू हुआ है। और वह है नब्बे वर्ष का सूरज के ऊपर। और वह और हैरान करने वाला है।

"और यह जो मैं कह रहा हूं ये सब वैज्ञानिक तथ्य हैं। ज्योतिषी इस संबंध में कुछ नहीं कहते हैं। लेकिन मैं इसलिए यह कह रहा हूं कि उनके आधार पर ज्योतिष को वैज्ञानिक ढंग से समझना आपके लिए आसान हो सकेगा।"

इजिप्ट के एक सम्राट ने आज से चार हजार साल पहले अपने वैज्ञानिको को कहा था कि नील नदी में जब भी जल घटता है, बढ़ता है, उसका पूरा ब्योरा रखा जाए। अकेली नील एक ऐसी नदी है जिसकी चार हजार वर्ष की बायोग्राफी है, उसकी जीवन कथा है पूरी। और किसी नदी की कोई बायोग्राफी नहीं है। कब इसमें इंच भर पानी बढ़ा है, उसका पूरा रिकार्ड है—चार हजार वर्ष फैरोह (Pharaoh) के जमाने से लेकर आज तक। फैरोह का अर्थ होता है—सूर्य, इजिप्शियन भाषा में। इजिप्ट में ऐसा ख्याल था कि सूर्य और नदी के बीच निरंतर संवाद है। और फैरोह, जो कि सूर्य का भक्त थे, उन्होंने कहा कि नील का पूरा रिकार्ड रखा जाए।

इजिप्ट के एक विद्वान ने पूरे नील की कथा लिखी और अब सूर्य के संबंध में वे बातें ज्ञात हो गयीं जो फैरोह के वक्त ज्ञात नहीं थीं। इन चार हजार साल में जो कुछ भी नील नदी में घटित हुआ है वह सूरज से संबंधित है। और नब्बे वर्ष की रिदम का पता चलता है, हर नब्बे वर्ष में सूर्य पर अभूतपूर्व घटना घटती है। वह घटना ठीक वैसी ही है जिसे हम मृत्यु कहते हैं—या जन्म कह सकते हैं। ऐसा समझ लें, सूर्य नब्बे वर्ष में पैंतालीस वर्ष तक जवान होता है और पैंतालिस वर्ष तक बूढ़ा होता है। सूरज जैसे जवान होता चला जाता है, और पैंतालीस साल के बाद ढलना शुरू हो जाता है। नब्बे वर्ष में सूर्य बिल्कुल बूढ़ा हो जाता है।

नब्बे वर्ष में जब सूर्य बूढ़ा होता है तब सारी पृथ्वी भूकंपों से भर जाती है। भूकंपों का संबंध नब्बे वर्ष के वर्तुल से है। सूर्य उसके बाद फिर जवान होना शुरू होता है। जब पृथ्वी जैसी महाकाय वस्तु भूकंपों से भर जाती है तो आदमी जैसी छोटी सी काया में कुछ भी न होता होगा? ज्योतिषी सिर्फ यही पूछते रहे हैं। वे कहते हैं, यह असंभव है। पता हो तुम्हें या न हो लेकिन आदमी की काया भी अछूती नहीं रह सकती।

पैंतालीस वर्ष जब सूरज जवान होता है उस वक्त जो बच्चे पैदा होते हैं, उनका स्वास्थ्य अद्भुत रूप से अच्छा होगा। और जब पैंतालीस वर्ष सूरज बूढ़ा होता है, उस वक्त जो बच्चे पैदा होंगे उनका स्वास्थ्य कभी भी अच्छा नहीं हो पाता। जब सूरज खुद ही ढलाव पर होता है तब जो बच्चे पैदा होते हैं उनकी हालत ठीक वैसी है जैसी पूरब को नाव ले जानी हो और पश्चिम को हवा बहती हो।

पृथ्वी की गति और कॉस्मिक इन्फ्लुएंस (Cosmic Influence)

आदमी इस विराट जगत में कुछ अलग-थलग नहीं है। इस सबका इकट्ठा जोड़ है। अब तक हमने जो भी श्रेष्ठतम घड़ियाँ बनाई हैं वह कोई भी उतनी सटीक समय नहीं बताती जितनी पृथ्वी बताती है। पृथ्वी अपनी कील पर तेईस घंटे छप्पन मिनट में एक चक्कर पूरा करती है। उसी के आधार पर हमने चौबीस घंटे का हिसाब तैयार किया हुआ है। लेकिन जब नब्बे वर्ष का वर्तुल पूरा होता है सूर्य का, तो पृथ्वी की घड़ी एकदम डगमगा जाती है। उस क्षण में पृथ्वी ठीक अपना वर्तुल पूरा नहीं कर पाती। ग्यारह वर्ष में जब सूरज पर उतार होता है—जब भी पृथ्वी अपनी यात्रा में नए-नए प्रभावों के अंतर्गत आती है तभी उसकी अंतर्-घड़ी डगमगा जाती है।

जब भी कोई नया प्रभाव, कोई नया 'कॉस्मिक इन्फ्लुएंस' (Cosmic Influence), कोई महातारा करीब हो जाता है तभी ऐसा हो जाता है। और करीब का मतलब, इस महा-आकाश में बहुत दूर होने पर भी चीजें बहुत करीब हैं। फासले बहुत बड़े हैं। उन फ़ासलों में जरा सा भी अंतर पड़ जाता है जो कि हमें कहीं पता भी नहीं चलेगा तो भी पृथ्वी की कील डगमगा जाती है। पृथ्वी को हिलाने के लिए बड़ी शक्ति की जरूरत है। इंच भर हिलाने के लिए भी! तो महाशक्तियां जब गुजरती हैं पृथ्वी के पास से, तभी वह हिल पाती है। और ऐसा नहीं हो सकता है कि जब पृथ्वी कंपित होती है तो उस पर लगे वृक्ष कंपित न हों। और ऐसा भी नहीं हो सकता है कि जब पृथ्वी कंपित होती है तो उस पर जीता और चलता हुआ मनुष्य कंपित न हो—सब कंप जाता है। लेकिन कंपन इतने सूक्ष्म हैं कि हमारे पास कोई उपकरण नहीं थे अब तक कि हम जांच करते। आदमी के कंपन को पकड़ने के उपकरण अभी भी हमारे पास नहीं हैं। वह मामला और भी सूक्ष्म है।

आदमी इतना सूक्ष्म है, और होना जरूरी है, अन्यथा जीना मुश्किल हो जाएगा। अगर चौबीस घंटे आपको चारों ओर के प्रभावों का पता चलता रहे तो आप जी न पाएंगे। एक और नियम ये है कि न तो हमें अपनी शक्ति से छोटे प्रभावों का पता चलता है और न अपनी शक्ति से बड़े प्रभावों का पता चलता है। हमारे प्रभाव के पता चलने का एक दायरा है। जैसे समझ लें कि 98 डिग्री हमारी एक सीमा है और 110 डिग्री हमारी दूसरी सीमा है। हम 12 डिग्री के दायरे में जीते हैं। हमारे आस-पास भयंकर आवाजें गुजर रही हैं, लेकिन हम सुन नहीं पाते। एक तारा टूटता है आकाश में, कोई नया ग्रह निर्मित होता है या बिखरता है तो भयंकर गर्जना वाली आवाजें हमारे चारों तरफ से गुजरती हैं। अगर हम उनको सुन पाएँ तो हम तत्काल बहरे हो जाएं। लेकिन हम सुरक्षित हैं क्योंकि हमारे कान सीमा में ही सुनते हैं।

जन्म का क्षण और एक्सपोज़र (Exposure)

जगत में न मालूम कितनी ध्वनियां हैं जो चारों तरफ हमारे गुजर रही हैं। वह पूरा कोलाहल हमें सुनाई नहीं पड़ता, लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते हैं। वह हमारे रोएं-रोएं को स्पर्श करता है। हमारे ह्रदय की धड़कन-धड़कन को छूता है। हमारे स्नायु-स्नायु को कंपा जाता है। वह अपना काम तो कर ही रहा है। जिस सुगंध को आप नहीं सूंघ पाते उसके अणु आपके चारों तरफ अपना काम तो कर ही जाते हैं।

ज्योतिष का कहना है कि हमारे चारों तरफ ऊर्जाओं के क्षेत्र हैं, 'एनर्जी फील्ड्स' (Energy Fields) हैं और वह पूरे समय हमें प्रभावित कर रहे हैं। जैसे ही बच्चा जन्म लेता है तो वह जगत के प्रभावों के प्रति खुल जाता है। जन्म को वैज्ञानिक भाषा में हम कहें 'एक्सपोज़र' (Exposure)। जैसे कि फिल्म को हम कैमरे में एक्सपोज़ करते हैं, जरा सा शटर आप दबाते हैं, एक क्षण के लिए कैमरे की खिड़की खुलती है और बंद हो जाती है। उस क्षण में जो भी कैमरे के समक्ष आ जाता है वह फिल्म पर अंकित हो जाता है।

जिस दिन मां के पेट में पहली दफा गर्भाधान होता है तो पहला एक्सपोज़र होता है। जिस दिन मां के पेट से बच्चा बाहर आता है, जन्म लेता है, उस दिन दूसरा एक्सपोज़र होता है। और वह दोनों एक्सपोज़र संवेदनशील चित्त पर फिल्म की भांति अंकित हो जाते हैं। पूरा जगत उस क्षण में बच्चा अपने भीतर अंकित कर लेता है और उसकी एम्पैथी (समानुभूति) निर्मित हो जाती है।

"ज्योतिष इतना ही कहता है कि सत्तर से लेकर नब्बे प्रतिशत बच्चे रात में पैदा होते हैं। अगर हम बुद्ध और महावीर से पूछें तो वह कहेंगे कि अधिक बच्चे इसलिए रात में जन्म लेते हैं क्योंकि अधिक आत्माएं सोयी हुई हैं।"

रात में एक बच्चा पैदा हो रहा है तो एक्सपोज़र एक तरह का होने वाला है। प्रकाश में पैदा होगा तो एक्सपोज़र भिन्न होगा। जो वैज्ञानिक एक्सपोज़र के संबंध में खोज करते हैं वे कहते हैं कि एक्सपोज़र की घटना बहुत बड़ी है। वैज्ञानिकों ने सैकड़ों प्रयोग किए। मुर्गी का बच्चा जन्म ले रहा है, अंडा फूट रहा है, चूजा बाहर निकल रहा है तो उन्होंने मुर्गी को हटा लिया और उसकी जगह एक रबर का गुब्बारा रख दिया। बच्चे ने जिस चीज को पहली दफा देखा वह रबर का गुब्बारा था, मां नहीं थी। आप चकित होंगे यह जानकर कि वह एक्सपोज़र हो गया। इसके बाद वह रबर के गुब्बारे को ही मां की तरह प्रेम कर सका।

इस संबंध में बहुत काम लॉरेंज (Konrad Lorenz) नाम के वैज्ञानिक ने किया है और उसका कहना है वह जो 'फर्स्ट मूवमेंट ऑफ एक्सपोज़र' है बड़ा महत्वपूर्ण है। अगर एक छोटा सा गुब्बारा मुर्गी के बच्चे के लिए इतना प्रभावी हो जाता है कि उसका चित्त सदा के लिए उससे निर्मित हो जाता है, तो ज्योतिष कहता है कि जो भी चारों तरफ मौजूद है, वह सभी का सभी उस प्रथम एक्सपोज़र के क्षण में, उस चित्त के खुलने के क्षण में भीतर प्रवेश कर जाता है। और जीवन भर की सिम्पैथी और एन्टीपैथी निर्मित हो जाती है। उस क्षण जो नक्षत्र पृथ्वी को चारों तरफ से घेरे हुए हैं वे सभी अनंत अर्थों में चित्त को संकेत कर जाते हैं।

हिरोशिमा का प्रभाव और महा-सूर्य

अब जैसे हिरोशिमा में एटम बम के गिरने के बाद पता चला, हिरोशिमा और नागासाकी में जो लोग मर गए—वह तो क्षण की बात थी। लेकिन जो वृक्ष बच गए, जो जानवर बच गए, जो पक्षी और आदमी बच गए वे सदा के लिए प्रभावित हो गए। अब वैज्ञानिक कहते हैं कि दस पीढ़ियों में हमें पूरा अंदाजा लग पायेगा कि क्या-क्या परिणाम हुए। क्योंकि उनका सब कुछ रेडियो एक्टिविटी से प्रभावित हो गया।

अगर एटम की रेडियो उर्जा ऐसा कर सकती है जो कि बहुत छोटी ताकत है। सूर्य के ऊपर जो ताकत है उसका हम इससे कोई हिसाब नहीं लगा सकते हैं—जैसे अरबों एटम बम एक साथ फूट रहे हों। उतनी रेडियो एक्टिविटी सूरज के ऊपर है। हिरोशिमा में जो घटना घटी है उसका प्रभाव दस मील से ज्यादा दूर नहीं पड़ा। दस करोड़ मील दूर सूरज है, चार अरब वर्षों से तो वह हमें सारी गर्मी दे रहा है। पर यह सूरज कुछ भी नहीं है। इससे भी महा सूर्य हैं। ये सब तारे जो हैं आकाश में, ये महा सूर्य हैं।

एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक, जो अंतरिक्ष में फैलती ऊर्जाओं के संबंध में अध्ययन कर रहा है—माइकल गाउक्लिन (Michel Gauquelin)। उसका कहना है कि जितनी ऊर्जाऐं हमें अनुभव में आ रही हैं, उनमें से हम एक प्रतिशत के संबंध में भी पूरा नहीं जानते। जब से हमने कृत्रिम उपग्रह छोड़े हैं, तब से उन्होंने हमें इतनी खबरें दी हैं कि हमारे पास न शब्द हैं उन खबरों को समझने के लिए, न विज्ञान है।

ज्योतिष: एक खोया हुआ महा-विज्ञान

ज्योतिष कोई विकसित होता हुआ नया विज्ञान नहीं है। हालत उल्टी है। ताजमहल अगर आपने देखा है तो यमुना के उस पार कुछ दीवारें आपको उठी हुई दिखाई पड़ी होंगी। कहानी यह है कि शाहजहाँ ने मुमताज के लिए तो सफेद ताजमहल बनवाया और अपने लिए संगमूसा (काले पत्थर) का महल वह यमुना के उस पार बना रहा था। पिछले तीन सौ सालों से यही समझा जाता था कि वह महल अधूरा रह गया। लेकिन अभी जो खोजबीन हुई है उससे पता चलता है कि वह किसी बनने वाले महल की दीवारें नहीं हैं, बल्कि गिरे हुए महल के खंडहर हैं। और यह भी पता चला है कि ताजमहल शाहजहाँ ने कभी नहीं बनवाया। वह भी हिंदुओं का बहुत पुराना महल है, जिसको उसने सिर्फ कन्वर्ट किया। ताजमहल जैसी एक भी कब्र दुनिया में किसी ने नहीं बनवायी।

ज्योतिष भी खंडहर की तरह है। एक बहुत बड़ा महल था, पूरा विज्ञान था, जो ढह गया। कोई नयी चीज नहीं है। लेकिन जो दीवारें रह गयी हैं उनसे कुछ पता नहीं चलता कि कितना बड़ा महल उसकी जगह रहा होगा। एरिस्टार्कस (Aristarchus) नाम के एक यूनानी ने जीसस से दो सौ वर्ष पूर्व यह सत्य खोज निकाला था कि 'हेलियोसेंट्रिक' (Heliocentric) सिद्धांत कि सूरज केंद्र पर है। लेकिन जीसस के सौ वर्ष बाद टॉलेमी (Ptolemy) ने इस सूत्र को उलट दिया और पृथ्वी को फिर केंद्र बना दिया। और फिर दो हजार साल लग गए केपलर और कॉपरनिकस को खोजने में वापस, कि सूर्य केंद्र है।

अमरीका कोलंबस ने खोजा, ऐसा पश्चिम के लोग कहते हैं। ऑस्कर वाइल्ड से एक व्यक्ति ने पूछा कि अगर कोलंबस ने पहली खोज नहीं की तो अमरीका बार-बार क्यों खो गया? तो ऑस्कर वाइल्ड ने मजाक में कहा कि कोलंबस ने पुनः खोज की ही है, "Rediscoved America! It was discovered so many times, but every time hushed-up." महाभारत अमरीका की चर्चा करता है। अर्जुन की एक पत्नी मेक्सिको की लड़की है। मेक्सिको में जो प्राचीन मंदिर हैं वे हिंदू मंदिर हैं जिन पर गणेश की मूर्तियां तक खुदी हुई हैं। बहुत बार सत्य खोज लिए जाते हैं और खो जाते हैं। ज्योतिष उन बड़े से बड़े सत्यों में से एक है जो पूरा का पूरा ख्याल में आ चुका था और खो गया है।

ज्योतिष के नाम पर सौ में से निन्यानबे धोखाधड़ी है। और वह जो सौवां आदमी है, निन्यानबे को छोड़कर उसे समझना बहुत मुश्किल है। क्योंकि वह कभी इतना डॉगमेटिक (Dogmatic) नहीं हो सकता कि कह दे कि ऐसा होगा ही। क्योंकि वह जानता है कि ज्योतिष बहुत बड़ी घटना है। एक आदमी कहता है, "मेरी नौकरी लग जाएगी या नहीं।" चाँद-तारों के प्रभाव से आपकी नौकरी के लगने, न लगने का कोई भी गहरा संबंध नहीं है। एक आदमी पूछता है कि मैं सड़क पर से गुजर रहा था और एक संतरे के छिलके पर पैर पड़ कर गिर पड़ा, तो मेरे चाँद तारे का इसमें कोई हाथ है या नहीं? ज्योतिष से इसका कोई लेना-देना नहीं है। और चूँकि ज्योतिषी इस तरह की बातचीत में लगे रहते हैं, इसलिए ज्योतिष का भवन गिर गया।

एसेंशियल और नॉन-एसेंशियल का भेद

महावीर एक गांव से गुजर रहे हैं। और महावीर का एक शिष्य मक्खलि गोशाल उनके साथ है। एक पौधे के पास से दोनों गुजरते हैं। गोशाल महावीर से कहता है, "यह पौधा लगा हुआ है—क्या सोचते हैं आप, यह फूल तक पहुँचेगा?" महावीर आँख बंद करके उसी पौधे के पास खड़े हो जाते हैं। महावीर आँख खोलकर कहते हैं कि यह पौधा फूल तक पहुँचेगा। गोशालक सामने ही पौधे को उखाड़ कर फेंक देता है और खिलखिलाकर हंसता है।

सात दिन के बाद वापस उसी रास्ते पर लौट रहे हैं। भयंकर वर्षा हुई थी। जब लौटते हैं तो ठीक उस जगह आकर महावीर खड़े हो गए। देखा कि वह पौधा खड़ा है! जोर से वर्षा हुई, उसकी जड़ें वापस गीली जमीन को पकड़ गयीं और पौधा खड़ा हो गया। महावीर ने कहा, "यह फूल तक पहुँचेगा। और इसीलिए मैं आँख बंद करके उसे देखा। इसकी आंतरिक पोटेंशियलिटी, इसकी आंतरिक संभावना क्या है। तुम इसे बाहर से फेंक दोगे तो भी यह अपने पैर जमाकर खड़ा हो सकेगा। यह जीने को तत्पर है। मैं जानता था कि तुम इसे उखाड़कर फेंक दोगे।"

गोशालक ने कहा, "आपको तो पता चल जाना चाहिए कि मैं उखाड़ कर फेंकूंगा या नहीं।" तब महावीर ने कहा, "वह गैर अनिवार्य (Non-Essential) है। उखाड़ कर फेंक भी सकते हो, नहीं भी। अनिवार्य (Essential) यह था कि पौधा अभी जीना चाहता था।"

जिस ज्योतिष की मैं बात कर रहा हूं उसका संबंध अनिवार्य से, एसेंशियल से, फाउण्डेशनल से है। आपकी उत्सुकता ज्यादा से ज्यादा सेमी-एसेंशियल (Semi-essential) तक आती है। पता लगाना चाहते हैं कि कितने दिन जियूंगा। लेकिन मरते क्षण में मैं क्या होऊंगा, क्या करूंगा? मुल्ला नसीरुद्दीन जैसा आदमी हंसता हुआ मरता है। मौत तो घटना है, लेकिन हंसते हुए मरना आत्मा है।

कर्म और स्वतंत्रता: मुहम्मद और अली का प्रसंग

एक बहुत मीठी कहानी आपको कहूं। मुहम्मद का एक शिष्य है, अली। अली मुहम्मद से पूछता है कि बड़ा विवाद है सदा से कि मनुष्य स्वतंत्र है अपने कृत्य में या परतंत्र है—बंधा है कि मुक्त है? अगर सब सुनिश्चित है तो समस्त शिक्षाएं बेकार हैं—सब पैगंबर, सब तीर्थंकर व्यर्थ हैं।

मुहम्मद ने कहा, "अली, एक पैर उठाकर खड़ा हो जा।" अली बेचारा बायां पैर उठा कर खड़ा हो गया। मुहम्मद ने कहा, "अब तू दायां भी उठा ले।" अली ने कहा, "आप क्या बात करते हैं!" तो मुहम्मद ने कहा, "अब तू चाहता पहले तो दाहिना भी उठा सकता था। अब नहीं उठा सकता। एक पैर उठाने को आदमी सदा स्वतंत्र है। लेकिन एक पैर उठाते ही तत्काल दूसरा पैर बंध जाता है।"

वह जो नॉन-एसेंशियल (गैर-जरूरी) हिस्सा है हमारी जिंदगी का, उसमें हम पूरी तरह पैर उठाने को स्वतंत्र हैं, लेकिन ध्यान रखना, उसमें उठाए गए पैर भी एसेंशियल हिस्से में बंधन बन जाते हैं। आदमी की सीमाएं हैं। सीमाओं के भीतर स्वतंत्रता है। स्वतंत्रता सीमाओं के बाहर नहीं है।

मुल्ला नसीरुद्दीन एक मस्जिद के नीचे से गुजर रहा है और एक आदमी मस्जिद के ऊपर से गिर पड़ा। मुल्ला के कंधे पर गिरा। मुल्ला की कमर टूट गई। अस्पताल में मुल्ला के शिष्यों ने कहा, "मुल्ला इस दुर्घटना की व्याख्या क्या है?" मुल्ला ने कहा, "इससे साफ जाहिर होता है कि कर्म का और फल का कोई संबंध नहीं है। कोई आदमी गिरता है, किसी की कमर टूट जाती है! इसलिए आज से कर्मफल के सिद्धांत की बातचीत बंद।"

स्थिति तीसरी है। जो बिलकुल सारभूत है, जो बिलकुल अंतरतम है, वह बिलकुल सुनिश्चित है। जितना हम अपने केंद्र की तरफ आते हैं उतना निश्चय के करीब आते हैं। जितना हम अपनी परिधि (Circumference) की तरफ जाते हैं, उतना संयोग की तरफ जाते हैं। जैसे, एक आदमी चोरी करने खड़ा है। चोरी करना कोई नियति नहीं है। स्वतंत्रता पूरी मौजूद है। हां, करने के बाद एक पैर उठ जाएगा, दूसरा पैर फंस जाएगा। हां और ना के बीच में आदमी का चित्त डोलता है। अगर वह ना करे तो केंद्र की तरफ आ जाएगा। अगर वह हां कर दे तो परिधि पर चला जाएगा।

ज्योतिष: अहंकार का विसर्जन

अगर ज्योतिष सही है तो मैं नहीं हूं; शक्तियों का एक प्रवाह है, उसी में एक छोटी लहर मैं हूं। अगर उसी वक्त देख लेता कि मैं नहीं हूं, बड़ी लहर है, बड़ा सागर है, तो कोई दुख न था। हां, वह तथाकथित सुख भी फिर नहीं हो सकता जो हम लेते रहते हैं कि "मैंने जीता, मैंने कमाया।" ज्योतिष आनंद का द्वार बन जाता है, अगर हम ऐसा देखें कि वह हमारी अस्मिता को गलाता है, हमारा अहंकार बिखेरता है।

"ज्योतिष का अर्थ ही यह है कि आप नहीं हो, जगत है। आप नहीं हो, ब्रह्मांड है। विराट शक्तियों का प्रभाव है, आप कुछ भी नहीं हो।"

अब वैज्ञानिक कहते हैं कि कम से कम पचास हजार ग्रहों पर जीवन होना चाहिए। इतने बड़े विराट जगत में अकेली पृथ्वी पर जीवन हो, यह संभव नहीं मालूम होता। अनंत फैलाव है। उस विराट पहिए में हम भी कहीं एक पहिए की किसी धुरी पर 'न होने' जैसे कहीं हैं।

मैंने सुना है कि एक आदमी एक हवाई जहाज में सवार हुआ। और जल्दी पहुंच जाए इसलिए तेजी से हवाई जहाज के भीतर चलने लगा। यात्रियों ने उसे पकड़ा और कहा कि आप क्या कर रहे हैं? जमीन पर वह जानता था कि जल्दी चलिए तो जल्दी पहुंच जाते हैं। हवाई जहाज पर भी वह जल्दी चल रहा था, इसका बिना खयाल किए कि उसका चलना अब असंगत है। अब हवाई जहाज चल ही रहा है। वह चल कर सिर्फ अपने को थका ले सकता है; जल्दी नहीं पहुंचेगा।

धार्मिक व्यक्ति मैं उसे कहता हूं जो इस जगत की विराट गति के भीतर विश्राम को उपलब्ध है। जो जानता है कि विराट चल रहा है, जल्दी नहीं है। मेरी जल्दी से कुछ होगा नहीं। अगर मैं इस विराट की लयबद्धता में एक बना रहूं, वही काफी है, वही आनंदपूर्ण है। यह खयाल में आ जाए तो ज्योतिष आपके लिए अध्यात्म का द्वार सिद्ध हो सकता है।

हमारा उद्देश्य यहाँ ज्योतिष के किसी भी मत का खंडन या पुष्टि करना कतई नहीं है। पाठक अपने विवेक के अनुसार सहमत या असहमत हो सकते हैं।

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