मंत्र और यंत्र

मंत्र और यंत्र

ग्रह संरेखण और आध्यात्मिक केंद्रण के लिए पवित्र ध्वनि और ज्यामितीय अभ्यास।

नीले, भूरे और सुनहरे ज्यामितीय रूपों वाला अलंकृत मंडल

मंत्र और यंत्र क्या हैं?

मंत्र पवित्र ध्वनियां, शब्द या वाक्य हैं — अक्सर संस्कृत में — जिनका जप एक आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में बार-बार किया जाता है। वैदिक परंपरा में, प्रत्येक ग्रह (ग्रह) के संबंधित मंत्र होते हैं जो उसके सकारात्मक गुणों को आमंत्रित करने और चुनौतीपूर्ण प्रभावों को कम करने के लिए माने जाते हैं। उदाहरण के लिए, गायत्री मंत्र सूर्य से जुड़ा है, और महामृत्युंजय मंत्र शिव और उपचार से।

यंत्र ज्यामितीय आरेख हैं — त्रिकोणों, वृत्तों और कमल की पंखुड़ियों के सटीक पैटर्न — जो ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के दृश्य प्रतिनिधित्व के रूप में काम करते हैं। प्रत्येक यंत्र किसी विशिष्ट देवता या ग्रह शक्ति से जुड़ा है और ध्यान और एकाग्रता के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में उपयोग किया जाता है।

मंत्र और यंत्र मिलकर एक दोहरा अभ्यास बनाते हैं: ध्वनि (शब्द) और रूप (रूप) मिलकर साधक को विशिष्ट ब्रह्मांडीय कंपनों के साथ संरेखित करने के लिए काम करते हैं। यह एक पारंपरिक आध्यात्मिक अनुशासन है, गारंटीकृत उपाय नहीं।

ये कैसे उपयोग किए जाते हैं

  • आपकी जन्मपत्रिका के आधार पर, लाभकारी प्रभावों को मजबूत करने या चुनौतीपूर्ण प्रभावों को कम करने के लिए विशिष्ट ग्रह मंत्रों की सिफारिश की जा सकती है।
  • यंत्रों को आमतौर पर खींचा, उकेरा या छापा जाता है और उचित अभिषेक के बाद किसी विशिष्ट दिशा में रखा या लॉकेट के रूप में पहना जाता है।
  • अभ्यास में नियमित जप (जप) शामिल होता है — अक्सर विशिष्ट संख्या में दोहराव — यंत्र पर केंद्रित ध्यान के साथ।
  • परंपरा निर्धारित करती है कि अभ्यास को कब, कहाँ और कैसे शुरू करना है, जिसमें शुभ समय और शुद्धिकरण अनुष्ठान शामिल हैं।

मंत्र विज्ञान

भारत की प्राचीन 14 विद्याओं में से एक विद्या मंत्र विज्ञान रहा है। इस बात से अधिकांशतः भारतीय भली-भांति परिचित हैं। आज भी मंत्रों के प्रयोग से बहुत सी समस्याओं को दूर किया जाता है। प्रश्न उठता है कि मंत्र क्या है और यह कैसे कार्य करता है — मंत्र विज्ञान का संबंध सीधा शरीर विज्ञान से है। मानव शरीर पांच तत्वों से बना है। पांचों तत्वों के अपने-अपने गुण होते हैं। पांचों तत्वों में से एक तत्व का नाम आकाश तत्व है और इसका गुण शब्द की उत्पत्ति का कारण आकाश है — कहते हैं शब्द कभी नष्ट नहीं होता।

शब्द, स्वर-व्यंजन और मर्म स्थान

शब्द, स्वर व व्यंजन के संयोजन से बनता है। मंत्रों का सीधा संबंध शरीर विज्ञान से है, अर्थात् मुख से बोले जाने वाले शब्दों में प्रयुक्त स्वर व व्यंजन का हमारे शरीर के मर्म स्थानों से सीधा संबंध होता है। जब हम कोई शब्द उच्चारित करते हैं तो शरीर के उन मर्म स्थानों पर स्पंदन होता है जिनके कारक उस शब्द में प्रयुक्त स्वर व व्यंजन हैं; उस स्पंदन से उस मर्म स्थान में ऊर्जा पैदा होती है और उस मर्म स्थान से जुड़े अंग-प्रत्यंग स्वस्थ रहते हैं।

आदि काल में हमारे ऋषि-मुनियों ने मर्म स्थानों से जुड़े स्वर व व्यंजन को शोध कर मंत्रों का निर्माण किया, जिनके सही और लयबद्ध गायन से प्रभावशाली क्रिया होती है जिससे मानव के विभिन्न प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। परन्तु अपनी भूख दूसरों के खाने से नहीं मिटती — यदि आप सोचते हैं कि मंत्रों का जाप आपके बदले कोई अन्य व्यक्ति कर ले तो भी आपको लाभ होगा, तो यह असत्य है। आपको लाभ तभी होगा जब आप स्वयं मंत्रों का जाप करेंगे। मंत्र तभी असरकारक विद्या हो सकती है जब मनुष्य मंत्रों का स्वयं उच्चारण करता है — यह भाषा विज्ञान साबित करता है।

  • नोट: मंत्र जाप करने वाला व्यक्ति सभी प्रकार के दुर्व्यसनों से बचेगा तो ही मंत्र फलकार होगा, अन्यथा नहीं।

यंत्र क्या है

यंत्र देवशक्तियों के प्रतीक हैं। जो व्यक्ति मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकते, उनके लिए पूजा में यंत्र रखने से ही मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। प्रत्येक यंत्र का अपना अलग महत्व है — कई यंत्र हमें सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं, कई हमारी गृह दशाओं में शांति के लिए प्रभाव डालते हैं, तो कुछ यंत्र हमें दुर्घटनाओं से बचाते हैं, हमारी मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं और हमें संपन्नता प्रदान करते हैं।

प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में सुख, समृद्धि, दीर्घ जीवन एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए यंत्र, तंत्र-मंत्र का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक महत्व की आकृतियां यंत्र के रूप में सोने, चांदी, तांबा, अष्टधातु अथवा भोज पत्र पर विभिन्न शक्तियों को जाग्रत करने के लिए बनाई जाती हैं। यंत्र पर बनाई गई आकृतियों की प्राण प्रतिष्ठा संबंधित देवी-देवता के मंत्रों से की जाती है। यंत्रों के बीज व तांत्रिक मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है ताकि वांछित परिणाम तुरंत मिल सके।

"यंत्र" संस्कृत का शब्द है जो मूल "यमं" से बना है, जिसका अर्थ है शक्ति देने वाला, उसे सुरक्षित रखने वाला, अथवा किसी विशेष तत्व, उद्देश्य या विचार में छुपी हुई शक्ति को जाग्रत करने वाला। यह एक ऐसी बाहरी रेखाकृति होती है जो आंतरिक रेखाकृति का आवरण होता है। प्रत्येक विशेष आकृति किसी विशेष उद्देश्य के लिए होती है। यंत्र एक प्रकार की ऐसी यांत्रिक उपकरण है जो किसी परियोजना या व्यवसाय के लिए उपलब्ध स्रोत व योग्यताओं का अधिकतम सफल उपयोग करने में सहायक होता है। 11वीं शताब्दी का संस्कृत ग्रंथ "समरांगण सूत्रधारा" में भी निर्माण योजना विज्ञान का विवरण मिलता है, जिसके अनुसार काष्ठ की उड़ती चिड़िया, काष्ठ के वायुयान, नर-मादा रोबोट आकृतियां जैसे यांत्रिक यंत्र निर्माण व उपयोग किए जाते थे। बाद में यंत्र के अर्थ का विस्तार हुआ और धार्मिक क्रियाओं तथा ईश्वर से संबंधित समस्त आयोजनों में इनके उपयोग का विशेष महत्व हो गया। मूलतः इस परिप्रेक्ष्य में यंत्र एक रेखांकित आकृति के रूप में ध्यान साधना एवं आध्यात्मिक जागृति का उपकरण है।

यंत्र का सिद्धांत

आध्यात्मिक यंत्र निम्नलिखित तीन सिद्धांतों का संयुक्त रूप है:

  • आकृति रूप — यंत्र ब्रह्मांड के आंतरिक धरातल पर उपस्थित आकार व आकृति का प्रतिरूप है। जैसे सभी पदार्थों का बाहरी स्वरूप कैसा भी हो, उसका मूल अणुओं का परस्पर संयुक्त रूप ही है, इसी प्रकार यंत्र में विश्व की समस्त रचनाएं निहित हैं। वैज्ञानिक भी संपूर्ण विश्व के अणु की आकृति एक विशेष क्रम में पाते हैं। यंत्र को विश्व की शक्ति विशेष को दर्शाने वाली आकृति कहा जा सकता है।
  • क्रिया रूप — एक फल या पत्ती की हमें एक बाह्य रचना दृष्टिगत होती है, परन्तु इसकी एक आंतरिक रचना भी होती है जिसमें एक ढांचा, न्यूक्लियस अथवा केंद्रीय कक्ष से संबंध रहता है। यंत्रों की प्रारंभिक आकृतियां मनोवैज्ञानिक चिन्ह हैं जो मानव की आंतरिक स्थिति के अनुरूप उसे अच्छे-बुरे का ज्ञान, उसमें वृद्धि या नियंत्रण संभव बनाती हैं। इसी कारण यंत्र "क्रिया रूप" है।
  • शक्ति रूप — निरंतर यंत्र की निष्ठापूर्वक पूजा करने से आंतरिक सुषुप्तावस्था समाप्त होकर आत्मशक्ति जाग्रत होती है और आकृति व क्रिया से आगे जाकर "शक्ति रूप" उत्पन्न होता है, जिससे स्वतः उत्पन्न आंतरिक परिवर्तन का मानसिक अनुभव होने लगता है। इस स्थिति पर आकर सभी रहस्य खुल जाते हैं।

प्राण प्रतिष्ठा और पूजा मार्गदर्शन

प्राण प्रतिष्ठा: यंत्र को पंचगव्य, पंचामृत एवं गंगाजल से पवित्र करके संबंधित मंत्र से यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। बिना प्राण प्रतिष्ठा के यंत्र का कार्य स्थल पर नहीं रखा जाता — ऐसा करने से नकारात्मक किरणों के प्रभाव से हानि होने की संभावना रहती है।

पूजा हेतु मार्गदर्शन: अनेक प्रकार के यंत्रों को एक बार प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात् नियमित पूजा की आवश्यकता नहीं होती और वे जीवन पर्यंत छिपाकर रखे जाते हैं। सोना, चांदी, तांबा आदि धातु निर्मित यंत्रों की नियमित पूजा इत्र, चावल, फूल, गुड़ आदि से की जाती है। यंत्र पूजा के लिए पीले रेशमी वस्त्र पर सीधे प्रतिष्ठित किए जाने चाहिए।

मंत्र और यंत्र अभ्यास पारंपरिक आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं, गारंटीकृत उपाय के रूप में नहीं।

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