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ज्योतिष अद्वैत का विज्ञान

ज्योतिष शायद सबसे पुराना विषय है और एक अर्थ में सबसे ज्यादा तिरस्कृत विषय भी है। सबसे पुराना इसलिए कि मनुष्य जाति के इतिहास की जितनी खोजबीन हो सकी उसमें ऐसा कोई भी समय नहीं था जब ज्योतिष मौजूद न रहा हो। जीसस से पच्चीनस हजार वर्ष पूर्व सुमेर में मिले हुए हडडी के अवशेषों पर ज्योतिष के चिन्ह अंकित है। पश्चिम में, पुरानी से पुरानी जो खोजबीन हुई है। वह जीसस से पच्चीस हजार वर्ष पूर्व इन हड्डियों की है। जिन पर ज्योतिष के चिन्हु और चंद्र की यात्रा के चिन्ह अंकित है। लेकिन भारत में तो बात और भी पुरानी है।

" ऋग्वेधद में पच्चान्नेबे हजार वर्ष पूर्व-नक्षत्रों की जैसी स्थिति थी उसका उल्लेख है। इसी आधार पर लोकमान्यम तिलक ने यह तय किया था कि ज्योतिष नब्बे हजार वर्ष से ज्यादा पुराने तो निश्चित है। क्योंकि वेद में यदि पच्चान्नोबे हजार वर्ष पहले जैसे नक्षत्रों की स्थिति थी, उसका उल्लेख है, तो वह उल्लेचख इतना पुराना तो होगा ही। क्योंकि उस समय जो स्थिति थी नक्षत्रों की उसे बाद में जानने का कोई भी उपाय नहीं था। अब जरूर हमारे पास ऐसे वैज्ञानिक साधन उपलब्ध हो सके हैं कि हम जान सकें अतीत में कि नक्षत्रों की स्थिति कब कैसी रही होगी।

 

ज्योतिष की सर्वाधिक गहरी मान्यताएं भारत में पैदा हुईं। सच तो यह है कि ज्योतिष के कारण ही गणित का जन्म‍ हुआ। ज्योतिष की गणना के लिए ही सबसे पहले गणित का जन्मो हुआ। इस लिए अंक गणित के जो अंक है वह भारतीय है। सारी दुनिया की भाषाओं में। एक से लेकर नौ तक जो गणना के अंक हैं, वे समस्त। भाषाओं में जगत की, भारतीय हैं। और सारी दुनिया में नौ डिजिट नौ अंक स्वींकृत हो गए है। वे नौ अंक भारत में पैदा हुए और धीरे-धीरे सारे जगत में फैल गए। जिसे आप अंग्रेजी में नाइन कहते है वह संस्कृत के नौ का ही रूपांतरण है। जिसे आप एट कहते है, वह संस्कृत के अष्टत का ही रूपान्त रण है। एक से लेकिन नौ तक जगत की समस्त सभ्य भाषाओं में गणित के नौ अंकों का जो प्रचलन है वह भारतीय ज्योतिष के प्रभाव में ही हुआ है।

भारत से ज्यो‍तिष की पहली किरणें सुमेर की सभ्यता में पहुंची। सुमेर वासियों ने सबसे पहले ईसा से छह हजार साल पूर्व पश्चिम के जगत के लिए ज्योतिष का द्वार खोला। सुमेर वासियों ने सबसे पहले नक्षत्रों के वैज्ञानिक अध्यन की आधार शिलाएं रखी। उन्होंने बड़े ऊंचे, सात सौ फिट ऊंचे मीनार बनाए और उन मीनारों पर सुमेर के पुरोहित चौबीस घण्टे आकाश का अध्यन करते थे। दो कारण से—एक तो सुमेर के तत्व विदों को इस गहरे सूत्र का पता चल गया था कि मनुष्य के जगत में जो भी घटित होता है। उस घटना का प्रांरभिक स्त्रोत नक्षत्रों से किसी न किसी भांति सम्बन्धित है।

 

जीसस से छह हजार वर्ष पहले सुमेर में यह धारणा थी की पृथ्वी पर जो भी बीमारी पैदा होती है, जो भी महामारी पैदा होती है वह सब नक्षत्रों से सम्बन्धित है। अब तो इसके लिए वैज्ञानिक आधार भी मिल गए है। और जो लोग आज के विज्ञान को समझते है वे कहते है कि सुमेर वासियों ने मनुष्य जाति का असली इतिहास प्रांरभ किया। इतिहासज्ञ कहते है कि सब तरह का इतिहास सुमेर से शुरू होता है। उन्नीस सौ बीस मैं चीजेवस्कीत नाम के एक रूसी वैज्ञानिक ने इस बात की गहरी खोजबीन शुरू की और पाय कि सूरज पर हर ग्यांरह वर्षों में पीरिर्योडिकली बहुत बड़ा होता है। सूर्य पर हर ग्या रह वर्ष में आणविक विस्फो ट होता है। और चीजवस्कीब ने यह पाया कि जब भी सूर्य पर ग्‍यारह वर्षों में आणविक विस्फो‍ट होता है। तभी पृथ्वी पर युद्ध और क्रांति यों के सूत्रपात होते है। और उसके अनुसार विगत सात सौ साल के लम्बे इतिहास में सूर्य पर जब भी कभी ऐसी घटना घटी है। तभी पृथ्वी पर दुर्घटनाएँ घटी है।

 

चीजवस्कीज ने इसका ऐसा वैज्ञानिक विश्ले षण किया था कि स्टैलिन ने उसे उन्नीस सौ बीस में उठाकर जेल में डाल दिया था। स्टैलिन के मरने के बाद ही चीजवस्की छूट सका। क्योंकि स्टैलिन के लिए तो अजीब बात हो गयी। मार्क्स का और कम्युनिस्ट का ख्यासल है कि पृथ्वीं पर जो क्रांतियां होती है। उनका मूल कारण मनुष्य-मनुष्य के बीच आर्थिक वैभिन्य है। और चीजवस्की कहता है कि क्रांतियों का कारण सूरज पर हुए विस्फो‍ट है। अब सूरज पर हुए विस्फोंट और मनुष्य के जीवन की गरीबी और अमीरी का क्या संबंध। अगर चीजवस्कीअ ठीक कहता है तो मार्क्स की सारी की सारी व्याख्या मिट्टी में चली जाती है। तब क्रांतियों का कारण वर्गीय नही रह जाता। तब क्रांतियों का कारण ज्योतिषीय हो जाता है। चीजवस्की को गलत तो सिद्ध नहीं किया जा सका क्यों कि सात सौ साल की जो गणना उसने दी थी इतनी वैज्ञानिक भी और सूरज में हुए विस्फोटों के साथ इतना गहरा संबंध उसने पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं का स्थापित किया था कि उसे गलत सिद्ध करना तो कठिन था। लेकिन उसे साइबेरिया में डाल देना आसान था। स्टैलिन के मर जाने के बाद ही चीजवस्कीथ को स्तिश्रचेव साइबेरिया से मुक्त कर पाया। इस आदमी के जीवन के कीमती पचास साल साइबेरिया में नष्टी हुए। छूटने के बाद भी वह चार-छह महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह सका। लेकिन छह महीने में भी वह अपनी स्थापना के लिए और नये प्रमाण इकट्ठे कर गया। पृथ्वी पर जितनी महामारियाँ फैलती है, उन सबका संबंध भी वह सूरज से जोड़ गया है।

 

सूरज, जैसा हम साधारण: सोचते है ऐसा कोई निष्कृत अग्रिका गोला नहीं है। वरन अत्यन्त सक्रिय और जीवन्त: अग्नि संगठन है। और प्रतिफल सूरज की तरंगों में रूपांतरण होते रहते है। और सूरज की तरंगों का जरा सा रूपांतरण भी पृथ्वीय के प्राणों को कंपित कर जाता हे। इस पृथ्वी पर कुछ भी ऐसा घटित नहीं होता जो सूरज पर घटित हुए बिना घटित हो जाता है। जब सूर्य का ग्रहण होता है तो पक्षी जंगलों में गीत गाना चौबीस घण्टे पहले से ही बंद कर देते है। पूरे ग्रहण के समय तो सारी पृथ्वीप मौन हो जाती है। पक्षी गीत बंद कर देते है और सारे जंगलों के जानवर भयभीत हो जाते है। किसी बड़ी आशंका से पीड़ित हो जाते है। बन्दार वृक्षों को छोड़कर नीचे आ जाते है। वे भीड़ लगा कर किसी सुरक्षा का उपाय करने लगते है। और एक आश्चर्य कि बन्दर तो निरन्तेर बातचीत और शोर-गुल में लगे रहते हे। सूर्य ग्रहण के वक्त इतने मौन हो जाते है जितने कि साधु और संन्यासी भी ध्यान में नहीं होते है। चीजेवस्कीव ने ये सारी की सारी बातें स्थापित की है। सुमेर में सबसे पहले यह ख्याल पैदा हुआ था। फिर उसके बाद पैरासेल्सास नाम के स्विस चिकित्सक ने इसकी पुनर्स्थापना की। उसने एक बहुत अनूठी मान्येता स्थापित की, और वह मान्य्ता आज नहीं तो कल समस्ता चिकित्सा विज्ञान को बदलने वाली सिद्ध होगी। अब तक उस मान्य‍ता पर बहुत जोर नहीं दिया गया है। क्योंकि ज्यो्तिष तिरस्कृत विषय है—सर्वाधिक पुरानी, लेकिन सर्वाधिक तिरस्कृत यद्यपि सर्वाधिक मान्य भी।

 

अभी फ्रांस में पिछले वर्ष गणना की गई तो सैंतालीस प्रतिशत लो ज्योतिष में विश्वास करते है। यह विज्ञान है—फ्रांस में, अमरीका में पाँच हजार बड़े ज्योतिषी दिन रात काम में लगे रहते है। और उनके पास इतने ग्राहक हैं कि वे पूरा काम भी निपटा नहीं पाते है। करोड़ों डालर अमरीका प्रति वर्ष ज्यो्तिषियों को चुकाता है। अन्दाज है कि सारी पृथ्वी पर कोई अठहत्तहर प्रतिशत लोग ज्योतिष में विश्वास करते हे। लेकिन वे अठहत्तर प्रतिशत लोग सामान्य हे। वैज्ञानिक, विचारक, बुद्धिवादी ज्योतिष की बात सुनकर ही चौंक जाते है। सी. जी. जुंग ने कहा है कि तीस वर्षों से विश्विद्यालयों के द्वार ज्योतिष के लिए बंद है, यद्यपि आनेवाले तीस वर्षों में ज्योतिष इन बंद दरवाज़ों को तोड़कर विश्वैविद्यलयों में पुन: प्रवेश पाकर रहेगा। प्रवेश पाकर रहेगा इसलिए कि ज्योतिष के संबंध में जो-जो दावे किए गए थे उनको अब तक सिद्ध करने का उपाय नहीं था। लेकिन अब उनको सिद्ध करने का उपाय है। पैरासेल्सरस ने एक मान्यता को गति दी और वह मान्यता यह थी कि आदमी तभी बीमार होता है। जब उसके और उसके जन्म के साथ जुड़े हुए नक्षत्रों के बीच का तारतम्या टुट जाता है। इसे थोड़ा समझ लेना जरूरी है। उससे बहुत पहले पाइथागोरस ने यूनान में, कोई ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व आज से कोई पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व पाइथागोरस ने प्लैनेटोरियम हार्मोन, ग्रहों के बीच एक संगीत का संबंध है—इसके संबंध में एक बहुत बड़े दर्शन को जन्म दिया था।

 

और पाइथागोरस जब यह बात कह रहा था तब वह भारत और इजिप्टज इन दो मुल्कों की यात्रा करके वापस लौटा था। और पाइथागोरस जब भारत बुद्ध और महावीर के विचारों से तीव्रता से आप्लसवित लौटा था। पाइथागोरस ने भारत से वापस लौटकर जो बातें कहीं है उसमें उसने महावीर ओ विशेषकर जैनों के संबंध में बहुत सी बातें महत्वलपूर्ण कहीं है। उसने जैनों का मतलब तो जैन,तो जैन दार्शनिकों पाइथागोरस ने जैनोसोफिस्ट् कहा है। वे नग्न रहते हैं, यह बात भी उसने की है। पाइथागोरस मानता था कि प्रत्येक नक्षत्र या प्रत्येक ग्रह या उपग्रह जब यात्रा कहता है, अंतरिक्ष में, तो उसकी यात्रा के कारण एक विशेष ध्व्नि पैदा होती है। प्रत्ये्क नक्षत्र की गति विशेष ध्वानि पैदा करती है। और प्रत्येयक नक्षत्र की अपनी व्येक्तिगत निजी ध्वनि है। और इन सारे नक्षत्रों की ध्वनियों का एक ताल-मेल है, जिसे वह विश्वक की संगीतवद्धता, हार्मनी कहता था। जब कोई मनुष्य जन्म लेता है तब उस जन्म के क्षण में इन नक्षत्रों के बीच जो संगीत की व्यावस्था होती है। वह उस मनुष्य के प्राथमिक, सरल तम, संवेदनशील चित पर अंकित हो जाती है। वही उसे जीवन भर स्वस्थ और अस्वस्थकरती है। जब भी वह अपनी उस मौलिक जन्म के साथ पायी गई, संगीत व्यवस्था् के साथ ताल मेल बना लेता है तो स्वस्थ हो जाता है। और जब उसका ताल मेल उस मूल संगीत से छूट जाता है तो वह अस्वास्थ हो जाता है। पैरासेल्सलस ने इस संबंध में बड़ा महत्वपूर्ण काम किया है कि वह किसी मरीज को दवा नहीं देता था जब तक उसकी जन्म कुण्डली न देख ले और बड़ी हैरानी की बात है कि पैरासेल्सेस ने जन्म कुण्डलियां देखकर ऐसे मरीजों को ठीक किया जिनको कि अन्य चिकित्सक कठिनाई में पड़ गए थे। और ठीक नहीं कर पा रहे थे। उसका कहना था, जब तक मैं न जान लूं कि यह व्य़क्तिठ किन नक्षत्रों की स्थिति में पैदा हुआ है तब तक इसके अंतरर्संगीत के सूत्र को भी पकड़ना सम्भव नहीं है। और जब तक मैं यह न जान लूं कि इसके अंतरर्संगीत की व्यवस्था क्या है तो इसे कैसे हम स्वंस्थ करें। क्योंकि स्वास्थ् का क्या् अर्थ है, इसे थोड़ा समझ लें। अगर साधारण: हम चिकित्सक से पूछे कि स्वा्स्य्कर का क्या अर्थ है तो वह इतना ही कहेगा कि बिमारी का न होना। पर उसकी परिभाषा निगेटिव है, नकारात्म‍क है और वह दुखद बात है कि स्वास्य् की परिभाषा हमें बमारी से करनी पड़े;स्वस्य्य तो पाजीटिव चीज है। विधायक अवस्था है। बीमारी निगेटिव है, नकारात्ममक है। स्वाहस्य्खद तो स्व‍भाव है, बीमारी तो आक्रमण है। तो स्वानस्य्र की परिभाषा हमें बीमारी से करना पड़े, यह बात अजीब है। घर में रहने वाले की परिभाषा मेहमान से करनी पड़े, यह बात अजीब है। स्‍वास्य्ना तो हमारे साथ है। बीमारी कभी होती है। स्वाधस्य्दू तो हम ले कर पैदा होते है। बीमारी उस पर आती हे। पर हम स्वासस्य्ार की परिभाषा अगर चिकित्सरकों से पूछे तो वे यही कह पाते है कि बीमारी नहीं है तो स्वारस्य्र है। पैरासेल्सरस कहता था, यह व्याकख्याक गलत हे। स्वारस्य्र की पाजीटिव डेफिनेशन, विधायक परिभाषा होनी चाहिए। पर उस पाजीटिव डेफिनेशन को उस विधायक व्यायख्याी को कहां से पकड़ेगे? तब पैरासेल्सस कहता था, जब तक हम तुम्हाारे अन्तार्निहित संगीत को न जान लें—क्योंपकि वहीं तुम्हाीरा स्वा स्य्ने है, तब तक हम ज्याहदा से ज्यालदा तुम्हाजरी बीमारियों से तुम्हायरा छुटकारा करवा सकते हे। लेकिन हम एक बीमारी से तुम्हेंक छुड़ाएंगे और दूसरी बीमारी तो तत्कािल पकड़ लेगी। क्योंेकि तुम्हामरे भीतर संगीत के संबंध में कुछ भी किया नहीं जा सका। असली बात तो यही थी कि तुम्हायरा भीतरी संगीत स्था पित हो जाए। इस संबंध में, पैरासेल्स स को हुए तो कोई पाँच सौ वर्ष होते है। उसकी बात भी खो गई थी। लेकिन अब पिछले बीस वर्षों में, उन्नीीस सौ पचास के बाद दुनिया में ज्यो तिष का अब पुन आर्विर्भाव हुआ है। और आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ नए विज्ञान पैदा हुए है। जिनके संबंध में आपसे कह दूँ तो फिर पुराने विज्ञान को समझना आसान हो जाएगा।

 

उन्नी स सौ पचास में एक नई साइंस का जन्मआ हुआ। उस साइंस का नाम है कास्मिेक केमिस्ट्री , ब्रह्म-रसायन। उसको जन्म‍ देने वाला आदमी है, जियारजी जिआ डी। यह आदमी इस सदी के कीमती से कीमती, थोड़े से आदमियों में एक है। इस आदमी ने वैज्ञानिक आधारों पर प्रयोगशालाओं में अनन्ते प्रयोगों को करके यह सिद्ध किया है कि जगत पूरा एक आर्गैनिक यूनिटी है। पूरा जगत एक शरीर है। और अगर मेरी उँगली बीमार पड़ जाती है। तो मेरा पूरा शरीर प्रभावित होता है। शरीर का अर्थ होता है टुकड़े अलग-अलग नहीं है । संयुक्तक है, जीवन्तय रूप से इकट्ठे है। अगर मेरी आँख में तकलीफ होती हे। तो मेरे पैर का अंगूठा भी उसे अनुभव करता है। और अगर मेरे पैर को चोट लगती है। तो मेरे ह्रदय को भी खबर मिलती हे। और अगर मेरा मस्तिरष्कक रूग्ण। हो जाता है तो मेरा शरीर पूरा का पूरा बेचैन हो जाता है। और अगर मेरा पूरा शरीर नष्टे कर दिया जाए तो मेरे मस्तितष्के को खड़े होने के लिए जगह मिलनी मुश्किूल हो जाएगी। मेरा शरीर एक आर्गैनिक यूनिटी है—एक एकता है जीवन्त । उसमें कोई भी एक चीज को छुओ जो सब तरंगित होता है, सब प्रभावित हो जाता है। कास्मिबक केमिस्ट्री कहती हे। कि पूरा ब्रह्माण्ड एक शरीर है। उसमें कोई भी चीज अलग-अलग नहीं है, सब संयुक्तट है। इसलिए कोई तारा कितनी ही दूर क्यों् न हो। जब वह ज्याकदा उत्तनप्त, होता है तब हमारे खून की धाराएं बदल जाती है—हर ग्या रह वर्षों में....। पिछली बार जब सूरज पर बहुत ज्याहदा गतिविधि चल रही थी और अग्नि् के विस्फो ट चल रहे थे तो एक जापानी चिकित्सरक तोमा तो बहुत हैरान हुआ। वह चिकित्स क स्त्रि यों के खून पर निरन्त र काम कर रहा था बीस वर्षों से। स्त्रिरयों के खून की एक विशेषता है जो पुरूषों के खून की नहीं है। उनके मासिक धर्म के समय उनका खून पतला हो जाता है। और पुरूष का खून पूरे समय एक-सा रहता है। स्त्रि यों का खून मासिक धर्म के समय खून में यह एक बुनियादी फर्क तोमा तो अनुभव कर रहा था। लेकिन जब सूरज पर बहुत जोर से तूफान चल रहे थे आणविक शक्ति यों के—जो कि हर ग्या रह वर्ष में चलते है। तब वह चकित हुआ कि पुरूषों का खून भी पतला हो जात है। जब सूरज पर आणविक तूफान चलता है। तब पुरूष का खून भी पतला हो जाता है। वह बड़ी नयी घटना थी। यह उसके पहले कभी रिकार्ड नहीं की गयी थी कि पुरूष के खून पर सूरज पर चलने वाले तूफान का कोई प्रभाव पड़ेगा। और अगर खून पर प्रभाव पड़ सकता है तो फिरा किसी भी चीज पर प्रभाव पड़ सकता है। एक दूसरा अमरीकन विचारक है फ्रैंक ब्राउन। वह अन्त रिक्ष यात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाने का काम करता रहा है। उसकी आधी जिन्दैगी अन्तअरिक्ष में जो मनुष्यि यात्रा करने जाएगा उसको तकलीफ न हो उसके लिए काम करने ही रही है। सबसे बड़ी विचारणीय बात यही थी कि पृथ्वी को छोड़ते ही अन्तहरिक्ष में न मालूम कितने प्रभाव होंगे। न मालुम कितनी धाराएं होंगी। रेडिएशन की किरणों की—वह आदमी पर क्याम प्रभाव करेंगी। लेकिन दो हजार साल से ऐसा समझा जाता है अरस्तू के बाद, पश्चिोम में कि अन्तनरिक्ष शून्य है, वहां कुछ है हीन हीं। दो सौ मील के बाद पृथ्वी, पर हवाएँ समाप्तं हो जाती है। और फिर अन्त‍रिक्ष शुन्यव है। वहां लेकिन अन्तरिक्ष यात्रियों की खोज ने सिद्ध किया कि वह बात गलत है। अन्तिरिक्ष शुन्यय नहीं है, बहुत भरा हुआ है। और न तो शून्यक है, न मृत है—बहुत जीवन्त् है। सच तो यह है कि पृथ्वीै की दो सौ मील की हवाओं की पर्तें सारे प्रभावों को हम तक आने से रोकती है। अन्तरिक्ष में तो अद्भुत परवाहों की धाराएं बहाती रहती है—उसको आदमी सह पायेगा या नहीं। आप यह जान कर हैरान होंगे और हंसेंगे भी कि आदमी को भेजने के पहले ब्राउन ने आलू भेजे अन्तहरिक्ष में। क्योंंकि ब्राउन का कहना है कि आलू और आदमी में बहुत भीतरी फर्क नहीं। अगर आलू सड़ जाएगा तो आदमी भी नहीं बच सकेगा और अगर आलू बच सकता है तो ही आदमी बच सकेगा। आलू बहुत मजबूत प्राणी है। और आदमी तो बहुत संवेदनशील है। अगर आलू लोट आता है। जीवंत मरता नहीं है और उसे जमीन में बोने पर अंकुर निकल आता है तो फिर आदमी को भेजा जा सकता है। तब डर है कि आदमी सह पायेगा या नहीं। इसमें एक और हैरानी की बात ब्राउन ने सिद्ध की कि आलू जमीन के भीतर पडा हुआ, या कोई भी बीज जमीन के भीतर पडा हुआ बढ़ता है.....सूरज के ही संबंध में, सूरज ही उसे जगाता, उठाता है। उसके अंकुर को पुकारता और ऊपर उठाता है। ब्राउन एक दूसरे शास्त्रर का भी अन्वेउषक है। उस शास्त्रर को अभी ठीक-ठीक नाम भी मिलना शुरू नहीं हुआ है। लेकिन अभी उसे कहते है—प्ले्नटरी हेरिडिटी, उपग्रही वंशानुक्रम। अंग्रेजी में शब्द है, होरोस्को प। वह यूनानी होरोस्कोहपस का रूप है। होरोस्कोवपस, युनानी शब्दा का अर्थ होता है, ‘’मैं देखता हूं जन्मरते हुए ग्रह को।‘’ असल में जब एक बच्चाू पैदा होता है तब उसी समय पृथ्वीो के चारों ओर, क्षितिज पर अनेक नक्षत्र जन्मस लेते हैं, उठते है। जैसे सूरज उगता है सुबह....। जैसे सूरज उगता है सुबह और सांझ डूबता है, ऐसे ही चौबीस घण्टेा अन्तसरिक्ष में नक्षत्र उगते है और डूबते है। जब एक बच्चा पैदा हो रहा है....समझें सुबह छह बजे बच्चान पैदा हो रहा है। वहीं वक्त सूरज भी पैदा हो रहा है। उसी वक्तै और कुछ नक्षत्र पैदा हो रहे हे। कुछ नक्षत्र ऊपर है, कुछ नक्षत्र उतार पर चले गए हे। कुछ नक्षत्र चढ़ाओं पर है।

 

जब एक बच्चाह पैदा हो रहा है तब अन्तहरिक्ष की—अन्त रिक्ष में नक्षत्रों की एक स्थिशती है। अब तक ऐसा समझा जाता था और अभी भी अधिक लोग जो बहुत गहराई से परिचित नहीं है वे ऐसा ही सोचते है कि चाँद-तारों से आदमी के जन्मे का क्या लेना देना। चाँद तारे कहीं भी हों इससे एक गांव में बच्चाअ पैदा हो रहा है, इससे क्या फर्क पड़ेगा। फिर वे यह भी कहते है कि एक ही बच्चाह पैदा नहीं होता, एक तिथि में, एक नक्षत्र की स्थि ति में लाखों बच्चे पैदा होते हे। उनमें से एक प्रैजिडेंट बन जाता हे। किसी मुल्के का, बाकी तो नहीं बन पाते। एक उनमें से सौ वर्ष का होकर मरता है,दूसरा दो दिन का ही मर जाता हे। एक उसमें से बहुत बुद्धिमान होता है और एक निर्बुद्धि ही रह जाता हे। तो साधारणत: देखने पर पता चलता है कि इन ग्रह-नक्षत्रों की स्थिीति का किसी के बच्चे के पैदा होने से, होरोस्को प से क्याग संबंध हो सकता है। यह तर्क सीधा और साफ मालूम होत है। फिर चाँद तारे एक बच्चेि के जन्मल की चिन्तार तो नहीं करते? और फिर एक बच्चाल ही पैदा नहीं होता, एक स्थिमति में लाखों बच्चेंच पैदा होते है। पर लाखों बच्चेऔ एक से नहीं होते, इन तर्कों से ऐसा लगने लगा....। तीन सौ वर्षों से यह तर्क दिये जा रहे हे कि कोई संबंध नक्षत्रों से व्यहक्ति के जन्मे का नहीं है। लेकिन ब्राउन, पिकाडी और इन सारे लोगों की, तोमा तो....। इन सबकी खोज का एक अद्भुत परिणाम हुआ है और वह यह कि ये वैज्ञानिक कहते है कि अभी हम यह तो नहीं कह सकते कि व्याक्तिहगत रूप से कोई बच्चा प्रभावित होता है। लेकिन अब हम यह पक्के रूप से कह सकते है, लेकिन जीवन निश्चिात रूप से प्रभावित होता है। और अगर जीवन प्रभावित होता है तो हमारी खोज जैसे-जैसे सूक्ष्मि होगी वैसे-वैसे हम पाएंगे कि व्यपक्तिा भी प्रभावित होता हे। इससे एक बात और ख्यामल में ले लेनी जरूरी है—जैसा सोचा जाता हे, वह तथ्यभ नहीं है। ऐसा सोचा जाता है कि ज्यो-तिष विकसित विज्ञान नहीं है। प्रांरभ उसका हुआ फिर वह विकसित नहीं हो सका। लेकिन मेरे देखे स्थिकति उल्टीह है,ज्योितिष किसी सभ्यहता के द्वारा बहुत बड़ा विकसित विज्ञान है लेकिन फिर वह सभ्यथता खो गयी और हमारे हाथ में ज्योयतिष के अधूरे सूत्र रह गए। ज्योएतिष कोई नया विज्ञान नहीं है जिसे विकसित होना है, बल्किो कोई विज्ञान है जो पूरी तरह विकसित हुआ था और फिर जिस सभ्य ता ने उसे विकसित किया वह खो गयी। और सभ्यवताएं रोज आती हैं और खो जाती है। फिर उनके द्वारा विकसित चीजें भी अपने मौलिक आधार खो देती है। सूत्र भूल जाते हैं, उनकी आधार शिलाएं खो जाती हे। विज्ञान, आज इसे स्वीाकार करने के निकट पहुंच रहा है कि जीवन प्रभावित होता हे। और एक छोटे बच्चेि के जन्मे के समय उसके चित की स्थिपति ठीक वैसी ही होती है जैसे बहुत सेंसिटिव फोटो-प्लेेट की। इस पर दो-तीन बातें और ख्यािल में ले लें,ताकि समझ में आ सके कि जीवन प्रभावित होता है। और अगर जीवन प्रभावित होता है, तो ही ज्योीतिष की कोई संभावना निर्मित होती है। अन्यअथा निर्मित नहीं होती। जुड़वाँ बच्चोंन को समझने की थोड़ी कोशिश करें। दो तरह के जुड़वाँ बच्चे होते हे। एक तो जुड़वाँ बच्चेु होते हे। जो एक ही अण्डेी से पैदा होते है। और दूसरे जुड़वाँ बच्चेो पैदा होते हे। जो जुड़वाँ जरूर होते है लेकिन दोनों अलग-अलग अण्डेे से पैदा होते है। मां के पेट में दो अण्डेे होते हे। दो बच्चे पैदा होते हे। कभी-कभी एक अण्डाड होता है और एक अण्डेच के भीतर दो बच्चे। होते है। एक अण्डे से जो दो बच्चेक पैदा होते हे। वे बड़े महत्वापूर्ण है। क्यों कि उनके जन्म। का क्षण‍ बिलकुल एक होता हे। दो अण्डों से जो बच्चेप पैदा होते हैं उन्हें हम जुड़वाँ बच्चेक कहते जरूर है लेकिन उनके जन्मह का क्षण एक नहीं होता। और एक बात समझ लें कि जन्मन दोहरी बात हे। जन्मप का पहला अर्थ तो है गर्भधारण। ठीक जन्मक तो उसी दिन होता हे। जिस दिन मां के पेट में गर्भ आरोपित होता हे—ठीक जन्मज, जिसको आप जन्म कहते है वह नम्बगर दो का जन्म हे—जब बच्चा, मां के पेट से बाहर आता है। अगर हमें ज्योउतिष की पूरी खोजबीन करनी हो—जैसा कि हिन्दु ओं ने की थी, अकेलेहिन्दुकओं ने की थी और उसके बड़े उपयोग किए थे। तो असली सवाल यह नहीं है कि बच्चाै कब पैदा होता हे। असली सवाल यह है कि बच्चाे कब गर्भ में प्रारम्भ करता है। अपनी यात्रा—गर्भ कब निर्मित होता है। क्योंवकि ठीक जन्मउ वहीं है। इसलिए हिन्दुतओं ने तो यह भी तय किया था कि ठीक जिस भांति के बच्चेन को जन्म देना हो उसे उस भांति के ग्रह-नक्षत्र में यदि सम्भोयग किया जाए और गर्भ धारण हो जाए तो उस तरह का बच्चां पैदा होगा। अब इसमें मैं थोड़ा पीछे कुछ कहूंगा क्योंठकि इस संबंध में भी काफी काम इधर हुआ और बहुत सी बातें साफ हुई है। साधारण: हम सोचते हैं कि जब एक बच्चास सुबह छह बजे पैदा होता है तो छह बजे पैदा होता हे। इसलिए छह बजे प्रभात में जो नक्षत्रों की स्थि ति होती है उससे प्रभावित होता हे। लेकिन ज्योहतिष को जो गहरे से जानते है वे कहते है कि वह छह बजे पैदा होने की वजह से ग्रह-नक्षत्र उस पर प्रभाव डालते हे—ऐसा नहीं। वह जिस तरह के प्रभावों के बीच पैदा होना चाहता है उस घड़ी और नक्षत्र को ही अपने जन्मह के लिए चुनता है। यह बिलकुल भिन्ने बात है। बच्चाक जब पैदा हो रहा है, ज्योततिष की गहन खोज करने वाले कहेंगे कि तब वह अपने ग्रह-नक्षत्र चुनता है कि कब उसे पैदा होना है। और गहरे जाएंगे तो वह अपना गर्भा धारण भी चुनता है। प्रत्ये क आत्माब अपना गर्भा धारण चुनती है, कि कब उसे गर्भ स्वी कार करना है, किस क्षण में। क्षण छोटी घटना नहीं है। क्षण का अर्थ है कि पूरा विश्व् उस क्षण में कैसा है। और उस क्षण में पूरा विश्व किस तरह की सम्भारवनाओं के द्वार खोलता है। जब एक अण्डे् में दो बच्चेअ एक साथ गर्भ धारण कर लेते है तो उनके गर्भा धारण का क्षण एक ही होता है और उनके जन्मा का क्षण भी एक होता है। अब यह बहुत मजे की बात है कि एक ही अण्डेा से पैदा हुए दो बच्चों का जीवन इतना एक जैसा होता है....इतना एक जैसा होता है कि यह कहना मुशिकल है कि जन्मन का क्षण प्रभाव नहीं डालता। एक अण्डेक से पैदा हुए दो बच्चों का आई क्यूब. उनका बुद्धि माप करीब-करीब बराबर होता है। और जो थोड़ा सा भेद दिखता है, वे जो जानते है, वे कहते है वह हमारीमेजरमेन्ट की गलती के कारण है। अभी तक हम ठीक मापदण्डै विकसित नहीं कर पाए हैं जिनसे हम बुद्धि का अंक नाप सकें। थोड़ा सा जो भेद कभी पड़ता है वह हमारे तराजू की भूल-चूक है। अगर एक अण्डे से पैदा हुए दो बच्चों को बिलकुल अलग-अलग पाला जाए तो भी उनके बुद्धि-अंक में कोई फर्क नहीं पड़ता—एक को हिन्दुलस्तागन में पाला जाए और एक को चीन में पाल जाए और कभी एक दूसरे को पता भी न चलने दिया जाए। ऐसी कुछ घटनाएं घटी है जब दोनों बच्चेक अलग-अलग पले बड़े हुए लेकिन उनके बुद्धि अंक में कोई फर्क नहीं पडा। बड़ी हैरानी की बात है, बुद्धि-अंक तो ऐसी चीज है कि जनम की पोटेंशियलिटी से जुड़ी है। लेकिन यह जो चीन में जुड़वाबच्चा है एक ही अण्डेु का, जब उसको जुकाम होगा। तब जो भारत में बच्चान है उसको भी जुकाम होगा। आमतौर से एक अण्डे् से पैदा हुए बच्चेस एक ही साल में मरते हे। ज्याादा से ज्याहदा उनकी मृत्युस में फर्क तीन महीने का होता हे। और कम से कम तीन दीन का पर वर्ष वहीं होता है। अब तक ऐसा नहीं हो सका है कि एक ही अण्डेै से पैदा हुए बच्चोंर के बीच वर्ष का फर्क पडा हो। तीन महीने से ज्या दा का फर्क नहीं पड़ता है। अगर एक बच्चाच मर गया है तो हम मान सकते है कि तीन दिन के बाद या तीन महीने के बीच दूसरा बच्चार भी मर जाएगा। इनके रुझान, इनके ढंग, इनके भाव समानांतर है। अगर करीब-करीब ऐसा मालूम पड़ता है कि ये दोनों एक ही ढंग से जीते है। एक दूसरे की कापी की भांति होते है। इनका इतना एक जैसा होना और बहुत सी बातों से सिद्ध होता है। हम सबकी चमड़ियां अलग-अलग हैं, इण्डी वीजुअल है। अगर मेरा हाथ टुट जाए और मेरी चमड़ी बदलनी पड़े तो आपकी चमड़ी मेरे हाथ के काम नहीं आयेगी। मेरे ही शरीर की चमड़ी उखाड़ कर लगानी पड़ेगी। इस पूरी जमीन पर कोई आदमी नहीं खोजा जा सकता,जिसकी चमड़ी मेरे काम आ जाए। क्याी बात है? शरीर शास्त्री से पूँछें कि क्याड दोनों की चमड़ी की बनावट में कोई भेद है—तो कोई भेद नहीं है। चमड़ी में जो तत्वद निर्मित करते है चमड़ी को उसमें कोई भेद है तो कोई भेद नहीं है। चमड़ी के रसायन में कोई भेद नहीं? चमड़ी में जो तत्वं निर्मित करते है चमड़ी को उसमें कोई भेद है—तो कोई भेद नहीं। चमड़ी में जो तत्वी निर्मित करते है चमड़ी को, उसमें कोई भेद नहीं है। मेरी चमड़ी और दूसरे आदमी की चमड़ी को अगर हम रख दें एक वैज्ञानिक को जांच करने के लिए तो वह यह न बता पाएगा कि ये दो आदमियों की चमड़ियां है। चमड़ियां में कोई भेद नहीं है। लेकिन फिर भी हैरानी की बात है कि मेरी चमड़ी पर दूसरे की चमड़ी नहीं बिठाई जा सकती। मेरा शरीर उसे इनकार कर देगा। वैज्ञानिक जिसे नहीं पहचान पाते कि कोई भेद है, लेकिन मेरा शरीर पहचानता हे। मेरा शरीर इनकार कर देता है। इसे स्वीोकार नहीं करता। हां,एक ही अण्डेर से पैदा हुए दो बच्चें की चमड़ी ट्रांसप्लां ट हो सकती है सिर्फ। एक दूसरे की चमड़ी को एक दूसरे पर बिठाया जा सकता है। शरीर इनकार नहीं करेगा। क्यां कारण होगा। क्याो वजह होगी? अगर हम कहें, एक ही मां-बाप के बेटे है तो दो भाई भी एक ही मां बाप के है। उनकी चमड़ी नहीं बदली जा सकती। सिवाय इसके कि ये दोनों बेटे एक क्षण में निर्मित हुए है और कोई इनमें समानता नहीं हे। क्यों कि उसी मां और उसी बाप से पैदा हुए दूसरे भाई भी हे, उन पर चमड़ी काम नहीं करती है। उनकी चमड़ी एक दूसरे पर नहीं बदली जा सकती। सिर्फ इनका बर्थ मूवमेंट.....बाकी जन्म का क्षण इतना महत्वसपूर्ण रूप से प्रभावित करता हे। कि उम्र भी करीब-करीब, बुद्धि माप भी करीब-करीब, दोनों की चमड़ियां का ढंग एक-सा, दोनों के शरीर के व्य,वहार करने की बात एक सी दोनों बीमार पड़ते है तो एक-सी बीमारियों से, दोनों स्वानस्थ होते हे, तो एक सी दवाओं से—क्याो जन्मे का क्षण इतना प्रभावी हो सकता है। ज्योोतिष कहता रहा है। इससे भी ज्याादा प्रभावी है, जन्मन का क्षण। लेकिन आज तक ज्योनतिष के लिए वैज्ञानिक सहमति नहीं थी। पर अब सहमति बढ़ती जाती हे। इस सहमति में कई नये प्रयोग सहयोगी बने है। एक तो जैसे ही हमने आर्टीफीशियल सेटेलाइट, हमने कृत्रिम उपग्रह अन्तनरिक्ष में छोड़े हे। वैसे ही हमें पता चला कि सारे जगत से सारे ग्रह-नक्षत्रों से, सारे ताराओं से निरंतर अनंत प्रकार की किरणों का जाल प्रवाहित होता हे। जो पृथ्वीइ पर टकराता है। और पृथ्वीर पर कोई भी ऐसी चीज नहीं है जो उससे अप्रभावित छूट जाए। हम जानते है कि चाँद से समुद्र प्रभावित होता है। लेकिन हमे ख्याहल नहीं है कि समुद्र में पानी और नमक का जो अनुपात है वही आदमी के शरीर में पानी और नमक का अनुपात हे—द सेम परफोरशन। और आदमी के शरी में पैंसठ प्रतिशत पानी हे। और नमक और पानी का वहीं अनुपात अरब की खाड़ी में है। अगर समुद्र का पानी प्रभावित होता है चाँद से तो आदमी के शरीर के भीतर का पानी क्योंह प्रभावित नहीं होगा। अभी इस संबंध में जो खोजबीन हुई है उसमें दो ती तथ्यँ ख्याील में ले लेने जैसे हे, वह यह कि पूर्णिमा के निकट आते-आते सारी दुनिया में पागलपन की संख्याद बढ़ती हे। अमावस के दिन दुनिया में सबसे कम लोग पागल होते है। पूर्णिमा के दिन पागलख़ानों में सर्वाधिक लोग प्रवेश करते है ओर अमावस के दिन पागलख़ानों से सर्वाधिक लोग बाहर आते हे। अब तो इसके स्टेतटिक्सओ अपलब्धा है।

 

अंग्रेजी में शब्दव है, लुनाटिक—लुनाटिक का मतलब होता है, चांद मारा। लुनार...हिन्दी में भी पागल के लिए चांद मारा शब्दब हे। बहुत पुराना शब्दन हे। और लुनाटिक भी कोई तीन हजार साल पुराना शब्दद है। इससे पता चलता है वे लोग जानते थे चाँद पागल के साथ कुछ न कुछ करता है। आखिर मस्तिष्क की बनावट, आदमी के शरीर के भीतर की संरचना तो एक जैसी है। हां यह हो सकता है कि पागल पर थोड़ा ज्या दा करता होगा। गैर-पागल पर थोड़ा कम कर सकता होगा। यह मात्रा का भेद होगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि गैर पागल पर बिलकुल नहीं करता होगा। तब तो कोई पागल कभी पागल न हों। क्योंीकि फिर सब गैर पागल ही पागल होते। पहले तो काम गैर-पागल पर ही करना पड़ता होगा चाँद को। प्रोफेसर ब्राउन ने एक अध्य यन किया है। वह खुद ज्योहतिष में विश्वाससी आदमी नहीं थे। अविश्वाहसी थे और अपने पिछले लेखों में उन्होंहने बहुत मजाक उड़ायी थी ज्योमतिष की। लेकिन पीछे उन्होंतने खोजबीन के लिए सिर्फ एक काम शुरू किया। मिलिट्री के बड़े-बड़े जरनलस की उन्होंनने जन्मख कुण्ड लियां इकट्ठी कीं—डाक्टीर्स की, अलग-अलग प्रोफेशंस की, व्यमवसायों की—बड़ी मुश्किनल में पड़ गए इकट्ठी करके की—डाक्ट र्स की, प्रोफेशन के आदमी एक विशेष ग्रह में पैदा होते है। एक विशेष नक्षत्र स्थि्ति में पैदा होते है। जैसे जितने भी बड़े प्रसिद्ध जरनलस है, मिलिट्री के सेनापति है, योद्धा हे—उनके जीवन में मंगल का भारी प्रभाव है। वही प्रभाव प्रोफेसर की जिन्द,गी में बिलकुल नहीं है। ब्राउन ने जो अध्य यन किया, कोई पचास हजार व्यनक्तिगयों की—जो भी सेनापति है उनके जीवन में मंगल के जन्म के समय मंगल प्रभाव भारी हे। आमतौर से जब वे पैदा होते है तब मंगल जन्मभ ले रहा होता है। उनके जन्मम की घड़ी मंगल के जन्मर की घड़ी होती हे। ठीक उससे विपरीत जितने पैयीफिस्टन है दुनिया में, जितने शान्ति‍वादी है, वह कभी मंगल के जन्म। के साथ पैदा नहीं होते। एकाध मामले में यह संयोग हो सकता है। लेकिन लाखों मामले में संयोग नहीं हो सकता। गणितज्ञ एक खास नक्षत्र में पैदा होते है। कवि उस नक्षत्र में कभी पैदा नहीं होते। यह कभी एकाध मामले में संयोग हो सकता है। लेकिन बड़े पैमाने पर संयोग नहीं हो सकता। असल में कवि के ढंग और गणितज्ञ के ढंग में इतना भेद है कि उनके जन्मस के क्षण में भेद होना ही चाहिए। ब्राउन ने कोई दस अलग-अलग व्यनवसाय के लोगों का जिनके बीच तीव्र फासले है जैसे कवि है, और गणितज्ञ है, या युद्ध खोर सेनापति है ओ एक शान्तिदवादी बर ट्रेंड रसल है, एक आदमी जो कहता है। विश्वढ में शान्ति होना चाहिए और एक आदमी नीत्सेन जैसा। जो कहता है जिस दिन युद्ध न होंगे उस दिन दुनिया में कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इनके बीच बौद्धिक विवाद ही है सिर्फ या नक्षत्रों का भी विवाद है? इनके बीच केवल बौद्धिक फासले है या इनकी जन्मब की घड़ी भी हाथ बँटाती है। जितना अध्यवयन बढ़ता जाता है। उतना ही पता चलता है कि प्रत्येधक आदमी जन्मब के साथ विशेष क्षमताओं की सूचना देता है। ज्योततिष के साधारण जानकार कहते है कि वह इस लिए ऐसा करता है क्योंओकि वह विशेष नक्षत्रों में पैदा हुआ हे। मैं आपसे कहना चाहता हूं कि विशेष नक्षत्रों की व्य वस्थां में पैदा होने को उसने चुना। वह जैसा होना चाह सकता था। जो उसके होने की आंतरिक संभावना थी, जो उसके पिछले जन्मों का पूरा का पूरा रूप था जो उसकी संयोजित अर्जित चेतना थी वह इस नक्षत्र में पैदा होगी। हर बच्चाथ हर आनेवाला नया जीवन इनसिस्टइ करता है, जोर देता है। अपनी घड़ी के लिए—अपनी घड़ी में ही पैदा होना चाहता है। अपनी घड़ी में गर्भाधान लेना चाहता हे। दो अन्योन्य श्रित है, इन्टर डिपेंडेंट हे1 मैंने आपसे कहा, जैसे समुद्र का पानी प्रभावित होता है, सारा जीवन पानी से निर्मित है। पानी के बिना कोई जीवन की संभावना नहीं है। इसलिए यूनान में पुराने दार्शनिक कहते थे। पानी से ही जीवन जन्माी है या पानी ही जीवन है। यहाँ पुराने भारतीय या चीनी और दूसरे दुनिया की मैथिोलिजी सभी कहती हे। आज विकास को मानने वाले वैज्ञानिक भी कहते है कि जीवन का जन्मथ पानी से है। शायद पहला जन्मो काई, वह जो पानी पर जम जाती है—वह जीवन का पहला रूप है, फिर आदमी तक विकास। जो लोग पानी के ऊपर गहन शोध करते है, वे कहते है पानी सर्वाधिक रहस्यतमय तत्वग है। जगत से, अन्त रिक्ष से तारों का जो भी प्रभाव आदमी तक पहुंचता है उसमंा मीडियम, माध्यीम पानी है। आदमी के शरीर के जल को ही प्रभावित करके कोई भी रेडिएशन कोई भी विकीर्णन मनुष्यध में प्रवेश करता है। जल पर बहुत काम हो रहा है और जल के बहुत से मिस्टीकरियस, रहस्यकमय गुण खयाल में आ रहे है। सर्वाधिक रहस्य गुण जो जल का जो ख्याणल में अभी दस वर्षों में वैज्ञानिकों को आया है वह यह है कि सर्वाधिक संवेदनशीलता जल के पास है—सबसे ज्याादा सेंसिटिव। और हमारे जीवन में चारों और से जो भी प्रभाव गतिमान होते है वह जल को ही कम्पिंत करके गति करते है। हमारा जल ही सबसे पहले प्रभावित होता है। और एक बार हमार जल प्रभावित हुआ तो फिर हमारा प्रभावित होने से बचना बहुत कठिन हो जाएगा। मां के पेट में बच्चा जब तैरता है। तब भी आप जानकर हैरान होंगे कि वह ठीक ऐसे ही तैरता है जैसे सागर के जल में। और मां के पेट में भी जिस जल में बच्चाव तैरता है उसमें भी नमक का वहीं अनुपात होता है जो सागर के जल में है। और मां के पेट से जो-जो प्रभाव बच्चेक तक पहुंचते है उनमें कोई सीधा संबंध नहीं होता। यह जानकर आप हैरान होंगे कि मां और उसके पेट में बनने वाले गर्भ का कोई सीधा संबंध नहीं होता, दोनों के बीच में जल और मां से जो भी प्रभाव पहुंचते है बच्चेन तक वह जल के माध्यीम से ही पहुंचते है। सीधा कोई संबंध नहीं है। फिर जीवन भर भी हमारे शरीर में जल का वहीं काम है जो सागर में काम है। सागर की बहुत सी मछलियों का अध्योयन किया गया। ऐसी मछलियाँ है, जो जब सागर का पूर उतार पर होता है, जब सागर उतरता है, तभी सागर के तट पर आकर अण्डेा रख जाती है। सागर उतर रहा है वापस मछलियाँ रेत पर आएँगी, सागर की लहरों पर सवार होकर, अण्डेर देंगी,सागर की लहरों पर वापस लौट जाएंगी। पंद्रह दिन में फिर सागर की लहरें फिर उस जगह आएँगी तब तक अण्डेक फुटकर चूज़े आ गए होंगे। आने वाली लहरें वापस उन चूजों को सागर में ले जाएंगी।

 

जिन वैज्ञानिकों ने इन मछलियों का अध्य्यन किया है वे बड़े हैरान हुए है। क्योंजकि मछलियाँ सदा ही उस समय अण्डे देने आती है जब सागर का तूफान उतारता होता है। अगर वह चढ़ते तूफान में अण्डे् दे दें तो अण्डेस तो तूफान में बह जाएंगे। वह अण्डें तभी देती है जब तूफान उतरता होता है, एक-एक कदम सागर की लहरें पीछे हटती जाती हे। वह जहां अण्डें देती है वह लहरें दुबारा नहीं आती फिर, नहीं तो लहरें अण्डेछ वहाँ लें जाएंगी। वैज्ञानिक बहुत परेशान रहे है कि इन मछलियों को कैसे पता चलता है कि सागर अब उतरेगा। सागर के उतरने की घड़ी आ गयी है। क्योंनकि जरा-सी भूल चूक समय की और अण्डेग तो सब बह जाएंगे, और उन्होंैने भूल चूक कभी नहीं की लाखों साल में, नहीं तो वे खत्म हो गयी होतीं। उन्होंतने कभी भूल की ही नहीं। पर इन मछलियों के पास क्या उपाय है जिनसे ये जान पाती है? इनके पास कौन-सी इन्द्रिीय है जो इनको बताती है कि अब सागर उतरेगा। लाखों मछलियाँ एक क्षण में किनारे पर इकट्ठी हो जाएगी। इनके पास जरूर कोई संकेत लिपि इनके पास कोई सूचना का यंत्र होना ही चाहिए। करोड़ो मछलियाँ दूर-दूर हजारों मील सागर तल पर इकट्ठी होकर अण्डेी रख जाएंगी एक खास घड़ी में। जो अध्यायन करते है, वे कहते है कि चाँद के अतिरिक्तच और कोई उपाय नहीं है। चाँद से ही इनको संवेदनाएं मिलती है। इन मछलियों को उन संवेदनाओं से पता चलता है कि कब उतार पर, कब चढ़ाव पर...। चाँद से जो उन्हें धक्केप मिलते है उन्हीं धक्कोंइ के अतिरक्तिै कोई रास्तार नहीं है। कि उनको पता चल जाएं। वह भी हो सकता है.....कुछ का ख्याकल था कि सागर की लहरों से कुछ पता चलता होगा। तो वैज्ञानिकों ने इन मछलियों को ऐसी जगह रखा जहां सागर की लहर ही नहीं हे। झील पर रखा, अंधेरे कमरों पर पानी में रखा। लेकिन बड़ी हैरानी की बात है। जब चाँद ठीक घड़ी पर आया....अंधेरे में बंद है मछलियाँ उनको चाँद का कोई पता नहीं, आकाश का कोई पता नहीं, पर जब चांद ठीक जगह पर आया, तब समुद्र की मछलियाँ जाकर तट पर अण्डेत देने लगीं—तब उन मछलियों ने पानी में ही अण्डे, दे दिए। उनका पानी में ही अण्डेण छोड़ देना... क्योंंकि कोई तट नहीं,कोई किनारा नहीं, तब तो लहरों का कोई सवाल ही नहीं रहा। अगर कोई कहता होगा कि दुसरी मछलियों को देख कर यह दौड़ पैदा हो जाती होगी तो वह भी सवाल न रहा। अकेली मछलियों को रखकर भी देखा। ठीक जब करोड़ो मछलियाँ सागर के तट पर आएँगी...। इनके दिमाग को सब तरह से गड़बड़ करने की कोशिश की—चौबीस घण्टे अंधेरे में रखा ताकि उन्हेंग पता न चलें की कब सुबह होती है। झूठे चाँद की रोशनी पैदा कर के देखी, रोज रोशनी को कम करते जाओ, बढ़ाते जाओ, लेकिन मछलियों को धोखा नहीं दिया जा सका। ठीक चाँद जब अपनी जगह पर आया तब मछलियों ने अण्डेब दे दिए। जहां भी थीं, वहीं उन्होंनने अण्डे दे दिए। हजारों लाखों पक्षी हर साल यात्रा करते है। लाखों हजारों मील की। सर्दियों आने वाली है, बर्फ पड़ेगी तो बर्फ के इलाके से पक्षी उड़ना शुरू हो जाएंगे। हजारों मील दूर किसी जगह वे पड़ाव डालेंगे। वहां तक पहुंचने में भी उन्हें दो महीने लगेंगे, महीना भर लगेगा। अभी बर्फ गिरनी शुरू नहीं हुई, महीने भर बाद गिरेगी। पक्षी कैसे हिसाब लगाते है कि महीने भर बाद बर्फ गिरेगी। क्योंपकि अभी हमारी मौसम को बताने वाली जो वेधशालाएं है वह भी पक्की खबर नहीं दे पाती हे। मैंने तो सुना है कि कुछ मौसम की खबर देनेवाले लोग पहले ज्योातिषियों से पूछ जाते है सड़को पर बैठे हुए कि आज क्या ख्या ल है। पानी गिरेगी कि नहीं? आदमी ने अभी जो-जो व्यलवस्थाि की है वह बचकानी मालूम पड़ती है। यह पक्षी एक डेढ़ महीने, दो महीने पहले पता करते है कि अब बर्फ कब गिरेगी, और हजारों प्रयोग करके देख लिया गया है कि जिस दिन पक्षी उड़ते है, हर पक्षी की जाति का निश्चित दिन है। हर वर्ष बदल जाता है वह निश्चिनत दिन क्योंअकि बर्फ का कोई ठिकाना नहीं। लेकिन हर पक्षी का तय है कि वह बर्फ गिरने के एक महीने पहले उड़ेगा तो हर वर्ष वह एक महीने पहले उड़ता है। बर्फ दस दिन बाद गिरे तो दस दिन बाद उड़ता है। बर्फ दस दिन पहले गिरे तो वह दस दिन पहले उड़ता है। बर्फ के गिरने का कुछ निश्चिसत तो नहीं है, यह पक्षी कैसे उड़ जात है महीने भर पहले पता लगाकर। जापान में ऐ चिड़िया होती है जो भूकम्पि आने के चौबीस घण्टे पहले गांव खाली कर देती हे। साधारण गांव की चिडिया है। हर गांव में बहुत होती है। भूकम्पक के चौबीस घण्टेट पहले चिड़िया गांव खाली कर देगी। अभी भी वैज्ञानिक दो घण्टेू के पहले भूकम्प् का पता नहीं लगा पाते। और दो घण्टे पहले भी अनसर्टेन्टीि होती है। पक्का नहीं होता है। सिर्फ प्रोबेबिलिटी होती है। सम्भादवना होती है। कि भूकम्पट हो सकता है। लेकिन चौबीस घण्टेन पहले जापान में तो भूकम्प का फौरन पता चल जाता है। जिस गांव से चिडिया उड़ जाती है उस गांव के लोग समझ जाते है कि भूकम्प आने वाला है। चौबीस घण्टे का समय उन्हें भाग जाने के लिए मिल जाता है। यह चिडिया हट गई, गांव मे दिखाई नहीं पड़ती। इस चिड़िया को कैसे पता चलता होगा? वैज्ञानिक अभी दस वर्षों में एक नयी बात कह रहे है और वह यक कि प्रत्येलक प्राणी के पास कोई ऐसी अन्तञर इन्द्रि य है जो जागतिक प्रभावों को अनुभव करती है। शायद मनुष्य् के पास भी है लेकिन मनुष्यग ने अपनी बुद्धिमानी में खो दिया है। मनुष्यअ अकेला ऐसा प्राणा है जगत में जिसके पास बहुत सी चीजें है जो उसने बुद्धिमानी में खो दी है और बहुत सी चीजें जो उसके पास नहीं थी उसने बुद्धिमानी में उसको पैदा करके खतरा मोल लिया है। जो है उसे खो दिया है जो नहीं है उसे बना लिया है। लेकिन छोटे-छोटे प्राणि यों के पास भी कुछ संवेदना के अन्तखर-स्त्रोमत है। और अब इसके लिए वैज्ञानिक आधार मिलने शुरू हो गए है। ये अन्त र-स्त्रोैत इस बात की खबर लाते है कि इस पृथ्वीा पर जो जीवन है वह आईसोलेटेड, पृथक नहीं हे। यह सारे ब्रह्माण्ड से संयुक्त है। और कहीं भी कुछ घटना घटती है तो उसके परिणाम यहां होने शुरू हो जाते है। जैसा मैं आपसे कह रहा था पैरासेल्सपस के संबंध में। आधुनिक चिकित्स।क भी इस नतीजे पर पहुंचे रहे है। कि जब भी सूर्य पर अनेक बार धब्बें प्रकट होते है....ऐसे भी सूर्य पर कुछ धब्बेह है, डाट्स, स्पाकट्स होते है—कभी वे बढ़ जाते है, कभी वे कम हो जाते है। जब सूर्य पर स्पाट्स बढ़ जाते है तो जमीन पर बीमारियां बढ़ जाती है। और जब सुर्य पर काले धब्बेब कम हो जाते है,तो जमीन पर बीमारियां कम हो जाती है। और जमीन से हम बीमारियां कभी न मिटा सकेंगे जब तक सूर्य के स्पाट्स कायम है। हर ग्या रह वर्ष में सूरज पर भारी उत्पामत होता है, बड़े विस्फोकट होते है। और जब ग्याररह वर्ष में सूरज पर विस्फोबट होता है, और उत्पामत होते है तो पृथ्वी पर युद्ध ओर उत्पा त होते है। पृथ्वीे पर युद्धों का जो क्रम है वह हर दस वर्ष का है। महामारी का जो क्रम है वह दस वर्ष के बीच का है। क्रान्ति यों का जो क्रम है दस वर्ष और ग्याैरह वर्ष के बीच का है। एक बार ख्यािल में आना शुरू हो जाए कि हम अलग और पृथक नहीं है, संयुक्ते है, आगें निक है तो फिर ज्यो तिष को समझाना आसान हो जाएगा। इस लिए ये में सारी बातें आपसे कह रहा हूं। कुछ आदमी को ऐसा ख्यााल पैदा हो गया था—अब भी है कि ज्योरतिष एक सुपरस्टीूशन, एक अन्ध विश्वास है। बहुत दूर तक यह बात सच भी मालूम पड़ती हे। असल में वहीं चीज अन्धु विश्वास मालूम पड़ने लगती है जिसके पीछे हम वैज्ञानिक कारण बताने में असमर्थ हो जाएं। वैसे ज्यो्तिष बहुत वैज्ञानिक है और विज्ञान का अर्थ ही होता है कि कॉज और एफेक्ट के बीच, कार्य और कारण के बीच संबंध की तलाश। ज्योटतिष कहता यही हे कि इस जगत में जो भी घटित होता है उसके कारण है। हमें ज्ञात न हो, ये हो सकता है। ज्योयतिष यह कहता है कि भविष्य जो भी होगा वह अतीत से विच्छि न्नह नहीं हो सकता, उससे जुड़ा हुआ होगा। आज कल जो भी होगा वह आज का ही जोड़ होगा। आज तक जो भी आप पर बीते हुए कल का जोड़ है। ज्योरतिष बहुत वैज्ञानिक चिन्त न है। वह यह कहता है कि भविष्यज अतीत से ही निकलता है। आपका आज कल से निकला है, आपका कल आज से निकलेगा। और ज्यो तिष यह भी कहता है कि जो कल होने वाला है वह किसी सूक्ष्मक अर्थों में आज भी मौजूद होना चाहिए।

 

अब इसे थोड़ा समझ ले। अब्राहम लिंकन ने मरने के तीन दिन पहले एक सपना देखा। जिसमें उसने देखा कि उसकी हत्याे कर दी गई है। और व्हाीइट हाऊस के एक खास कमरे में उसकी लाश पड़ी हे। उसने नंबर भी कमरे का देखा। उसकी नींद खुल गई। वह हंसा, उसने अपनी पत्नीड को कहा कि मैने एक सपना देखा है कि मेरी हत्याव कर दी गयी है....फलां-फलां नंबर,उसी मकान में तो वह सोया हुआ था। व्हाैइट हाउस मे। इस मकान के फलां नम्बर के कमरे में मेरी लाश पड़ी है। मेरे सिरहाने तू खड़ी हुई है और आस-पास फलां-फलां लोग खड़े हुए है। हंसी हुई, बात हुई—लिंकन सो गया, पत्नील सो गई। तीन दिन बाद लिंकन की हत्यार हुई और उसी कमरे में और उसी जगह उसकी लाश तीन दिन बाद पड़ी थी। और उसी क्रम में आदमी खड़े थे। अगर तीन दिन बाद जो होने वाला है वह किसी अर्थों में आज ही न हो गया हो ताह उसका अपना कैसे निर्मित हो सकता है। उसकी सपने में झलक भी कैसे मिल सकती है। सपने में झलक तो उसी बात की मिल सकती है जो किसी अर्थ में अभी भी कहीं मौजूद हो। तो हम उसकी एक ग्लिसम्स्सक , खिड़की खोले और हमें दिखायी पड़ जाए लेकिन खिड़की के बाहर मौजूद हो, लेकिन कहीं मौजूद हो। ज्यो तिष का मानना है कि भविष्य हमारा अज्ञान है इसलिए भविष्यज है। अगर हमें ज्ञान हो तो भविष्यद जैसी कोई घटना नहीं है। वह अभी भी कहीं मौजूद है। महावीर के जीवन में एक घटना का उल्लेख है, जिस पर एक बहुत बड़ा विवाद चला। और महावीर के अनुयायियों का एक वर्ग टूट गया। और पाँच सौ महावीर के मुनियों ने अलग पंथ का निर्माण कर लिया उसी बात से। महावीर कहते थे जो हो रहा है वह एक अर्थ में हो ही गया है। अगर आप चल पड़े तो एक अर्थ में पहुंच ही गए। अगर आप बूढ़े हो रहे है तो एक अर्थ में बूढ़े हो ही गए। महावीर कहते थे, जो हो रहा है, जो क्रियमाण है—वह हो ही गया। महावीर का एक शिष्यय वर्षा काल में महावीर से दूर जा रहा था। उसने अपने एक शिष्यै को कहा कि मेरे लिए चटाई बिछा दो। उसने चटाई बिछानी शुरू की। मुड़ी हुई, गोल लिपटी हुई चटाई को उसने थोड़ा सा खोला, तब महावीर के उस शिष्यक को ख्यािल आया कि ठहरो, महावीर कहते है—जो हो रहा है वही हो ही गया। तू आधे में रूक जा, चटाई खुल तो रही है, लेकिन खुल नहीं गयी है—रूक जा। उसे अचानक ख्यारल हुआ कि यह तो महावीर बड़ी गलत बात कहते हे। चटाई आधी खुली है, लेकिन खुल कहां गई है। उसने चटाई वहीं रोक दी। वह लौटकर वर्षा काल के बाद महावीर के पास आया और उसने कहा कि आप गलत कहते है कि जो हो रहा है, वह हो ही गया। क्योंसकि चटाई अभी भी आधी खुली रखी है—खुल रही थी, लेकिन खुल नहीं गई। तो मैं आपकी बात गलत सिद्ध करने आया हूं। महावीर न उससे जो कहा,वह नहीं समझ पाया होगा, वह बहुत बुद्धि का राह होगा, अन्य था ऐसी बात लेकर नहीं आता। महावीर ने कहा, तूने रोका—रोक ही रहा था....ओर रूक ही गया। वह जो चटाई तू रोका—रोक रहा था...रूक गया। तूने सिर्फ चटाई रुकते देखी,एक और क्रिया भी साथ चल रही थी, वह हो गयी। और फिर कब तक तेरी चटाई रुकी रहेगी। खुल नी शुरू हो गयी है—खुल ही जाएंगी....तू लोट कर जा वह जब लौटकर गया तो देखा एक आदमी खोलकर उस पर लेटा हुआ है। विश्राम कर रहा था। इस आदमी ने सब गड़बड़ कर दिया। पूरा सिद्धांत ही खराब कर दिया। महावीर जब यह कहते थे जो हो रहा है वह हो ही गया तो वह हय कहते थे, जो हो रहा है वह तो वर्तमान है, जो हो ही गया वह भविष्यो है। कली खिल रही है। खिल ही गई—खिल ही जाएगी। वह फूल तो भविष्यह में बनेगी, अभी तो खिल ही रही है। अभी तो कली ही है। जब खिल ही रही है तो खिल ही जाएगी। उस का खिल जाना भी कहीं घटित हो गया। अब इसे हम जरा और तरह से देखें, थोड़ा कठिन पड़ेगा। हम सदा अतीत से देखते है। कली खिल रही है। हमारा जो चिन्तगन है, आमतौर से पास्ट ओरिएंटेड़ है, वह अतीत से बंधा है। कहते है कली खिल रही हे, फूल की तरफ जा रही है। कली फूल बनेगी...लेकिन इससे उल्टात भी हो सकता है। यह ऐसा है जैसे मैं आपको पीछे से धक्केज दे रहा हूं, आपको आगे सरका रहा हूं। ऐसा भी हो सकता है कोई आपको आगे खींच रहा हो। गति दोनों तरफ हो सकती है। मैं आपको पीछे से धक्काभ दे रहा हूं,और आप आगे जा रहे हो।

 

ज्योतिष का मानना है कि यह अधूरी कि अतीत धक्काक दे रहा है और भविष्यध हो रहा हे। पूरी दृष्टिो यह है कि अतीत धक्का दे रहा है और भविष्या खींच रहा है। कली फूल बन रही है,इतनी ही नहीं—फूल कली को फूल बनने के लिए पुकार रहा है। खींच रहा है, भविष्ये आगे हे। अभी वर्तमान के क्षण में एक कली है। पूरा अतीत धक्कान दे रहा हे। खुल जाओ। पूरा भविष्यी आह्वान दे रहा है, खुल जाओ, अतीत और भविष्यज दोनों के दबाव में कली फूल बनेगी। अगर कोई भविष्या न हो तो अतीत अकेला फूल न बना पाएगा। क्यों कि भविष्यब में आकाश चाहिए फूल बनने के लिए। भविष्यन में जगह चाहिए स्पेलस चाहिए। भविष्यो स्थावन दे तो ही कली फूल बन पाएगी। अगर कोई भविष्य न हो तो अतीत कितना ही सिर मारे, कितना ही धक्काी माने—मैं आपको पीछे से कितना ही धक्काक मारू, या दूँ। लेकिन सामने एक दीवार हो तो मैं आपको आगे न हटा पाऊँ गा। आगे जगह चाहिए। मैं धक्काी दूँ और आगे की जगह आपको स्वीआकार कर ले, आमंत्रण दे-दे कि आ जाओ,अतिथि बना लें, तो ही मेरा धक्काए सार्थक हो पाए। मेरे धक्केग के लिए भविष्य में जगह चाहिए। अतीत काम करता है भविष्यल जगह देता है। ज्योकतिष की दृष्टित यह है कि अतीत पर खड़ी हुई दृष्टि अधूरी है, आधी—वैज्ञानिक हे, भविष्यल पूरे वक्तत पुकार रहा है,पूरे वक्तव खींच रहा है। हमें पता नहीं हमें दिखाई नहीं पड़ता। यह हमारी आँख की कमजोरी है, यह हमारी दृष्‍टि की कमजोरी है। हम दूर नहीं देख पाते हमें कल कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। कृष्णह मूर्ति की जन्मम कुण्ड ली देखें कभी तो हैरान होंगे। अगर ऐनि बी सेन्ट और लिड बिटर ने फिक्र की होती और कृष्णत मूर्ति की जन्मण कुण्ड ली देख ली होती तो भूलकर भी कृष्णट मूर्ति के साथ मेहनत नहीं करनी चाहिए थी। क्योंमकि जनम कुण्डेली में साफ है बात की कृष्ण् मूर्ति जिस संगठन से सम्बतन्धिात होंगे—उस संगठन को नष्ट‍ करनेवाले होंगे। जिस संस्था‍ से सम्बतन्धिसत होंगे,उस संस्थाो को विसर्जित करवा देंगे—जिस संगठन के सदस्यस बनेंगे, वह संगठन मर जाएगा। लेकिन ऐनि बीसेन्ट भी मानने को तैयार नहीं होती। कोई सोच भी नहीं सकता था, लेकिन हुआ वही। थियोसाफी ने उन्हें् खड़ा करने की कोशिश की थी। थियोसाफी को उनकी वजह से इतना धक्काि लगा की वह सदा के लिए मर गया आन्दोिलन। फिर ऐनि बी सेन्ट ने ‘’स्टाआर ऑफ दी ईस्टक‘’ नाम से बड़ी संस्थाथ खड़ी की। फिर एक दिन कृष्ण‘ मूर्ति उस संस्था को विसर्जित करके अलग हो गए। ऐनि बी सेन्ट ने पूरा जीवन उस संस्था‍ को खड़ा करने में समर्पित किया और नष्ट किया अपने को। लेकिन उसमें कृष्णो मूर्ति का भी कुछ बहुत हाथ नहीं है। वह जिन नक्षत्रों की छाया में पैदा हुए है उन नक्षत्रों की सीधी सूचना है। वह किसी संस्थाै में भी डिस्ट्रिक्ट सिद्ध होंगे। किसी भी संस्थात के भीतर वह विघटनकारी सिद्ध होंगे। भविष्य एकदम अनिश्चिधत नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्चितत है। हमारा अज्ञान भारी है। भविष्यै में हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हम अंधे है। भविष्यअ का हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता है इसलिए हम कहते है कि निश्चि त नहीं है। लेकिन भविष्य में दिखाई पड़ने लगे....ओर ज्यो तिष भविष्यच में देखने की प्रक्रिया है। तो ज्योनतिष सिर्फ इतनी ही बात नहीं है कि ग्रह-नक्षत्र क्या कहते है। उनकी गणना क्या कहती है। यह तो सिर्फ ज्योोतिष का एक डायमेंशन है, एक आयाम है। फिर भविष्यय को जानने के और आयाम भी है। मनुष्य् के हाथ पर खींची हुई रेखाएं है, मनुष्यम के माथे पर खींची हुई रेखाएं है, मनुष्यव के पैर पर खींची हुई रेखाएं है। पर ये भी बहुत उपरी है। मनुष्यह के शरीर में छिपे हुए चक्र हे। उन सब चक्रों को अलग-अलग संवेदन है। उन सब चक्रों की प्रति पल अलग-अलग गति है। फ्रीक्वें सी है। उनकी जांच है। मनुष्यक के पास छिपा हुआ, अतीत का पूरा संस्कासर बीज है। रान हुब्बाउर्ड ने एक नया शब्दय, एक नयी खोज पश्चिपम में शुरू की है—पूरब के लिए तो बहुत पुरानी है। वह खोज है—टाईम ट्रैक। हुब्बा्र्ड का ख्याशल है कि प्रत्येसक व्यूक्ति जहां भी जिया है इस पृथ्वी पर या कहीं और किसी ग्रह पर—आदमी की तरह या जानवर की तरह या पौधे की तरह या पत्थीर की तरह। आदमी जहां भी जिया है अनंत यात्रा में—उस...पूरा का पूरा टाईम ट्रैक, समय की पूरी की पूरी धारा उसके भीतर अभी भी संरक्षित है। वह धारा खोली जा सकती है। और उस धारा में आदमी को पुन: प्रवाहित किया जा सकता है।

 

हुब्बार्ड की खोजों में यह खोज बड़ी कीमत की है। इस टाईम ट्रैक पर हुब्बा र्ड ने कहा है कि आदमी के भीतर इनग्रन्से है। एक तो हमारे पास स्मृ ति है जिससे हम याद रखते है कि कल यह हुआ, परसों क्याह हुआ। वह काम चलाऊ स्मृमति है। वह रोज बेकार हो जाती है। वह असली नहीं है। वह स्था यी भी नहीं है। यह हमारी काम चलाऊ स्मृतति है जिससे हम रोज काम करते है,इसे रोज फेंक देते है। और उससे गहरी एक स्मृति है जो काम चलाऊ नहीं हे। जो हमारे जीवन के समस्तस अनुभवों का सार है,अनंत जीवन पथों पर लिए गए अनुभवों का सार इक्ट्ठा है। उसे हुब्बाअर्ड ने इनग्रेन कहा है। वह हमारे भीतर इनग्रेन हो गयी है। वह भीतर गहरे में दबी हुई पड़ी हे। पूरी की पूरी। जैसे कि एक टेप बन्दह आपके खीसे में पडा हो। उसे खोला जा सकता है। और जब उसे खोला जाता है तो महावीर उसको कहते जाति-स्म रण, हुब्बाहर्ड कहता है, टाईम ट्रैक—पीछे लौटना समय में। जब उसे खोला जाता है तो ऐसा नहीं होता कि आपको अनुभव हो कि आप रिमम्बपर कर रहे है। ऐसा नहीं होता है कि आप याद कर रहे है—‘’यू री-लीव’’ जब वह खुलती है जब टाईम ट्रैक खुलता है तो आपको ऐसा अनुभव नहीं होता है कि मुझे याद आ रहा है। न आप पुन: जीते है। समझ लें, अगर टाईम ट्रैक आपका खोला जाए, जो कि खोलना बहुत कठिन नहीं है और ज्यो तिष उसके बिना अधूरा है। ज्योईतिष की बहुत गहनत्म, जो पकड़ है वह तो आपके अतीत के खोलने की है क्यों कि आपका अतीत का अगर पूरा पता चल जाए तो आपका पूरा भविष्यक पता चलता है। क्योंउकि आपका भविष्यर आपके अतीत से जन्मे गा। आपके भविष्यय को आपके अतीत को जाने बिना नहीं जाना जा सकता है। क्योंरकि आपका अतीत आपके भविष्यक का बेटा होने वाला है। उसी से पैदा होगा। तो पहले तो आपके अतीत की पूरी स्मृीति-रेखा को खोलना पड़े....अगर आपकी स्मृाति रेखा को खोल दिया जाए.....जिस की प्रक्रियाएं है और विधियां है। आप अगर समझ लें कि आपको याद आ रहा है कि आप छह वर्ष के बच्चेक है और आपके पिता ने चांटा मारा है तो आपको ऐसा याद नहीं आयेगा कि आपको याद आ रहा है। कि आप छह वर्ष के बच्चेर है और पिता चांटा मार रहे है। ‘’यू विल री-लीव इट’’। आप इसको पुन: जिएँ गे और जब आप इसको जी रहे होंगे, अगर उस वक्तद मैं आपसे पुछूं कि तुम्हायरा नाम क्या है। तो आप कहेंगे बबलू, आप नहीं कहेंगे पुरुषोत्तम दास। छह वर्ष का बच्चाा उत्तमर देगा। आप री-लीव कर रहे है उस वक्तब,आप स्मंरण नहीं कर रहे है। पुरुषोत्तचम दास स्म्रण नहीं कर रहे है कि जब मैं छह वर्ष का था...न पुरूषोत्तम दास छह वर्ष के हो गए। वह कहेंगे बबलू उस वक्तह वह जो-जो जवाब देंगे वह छह वर्ष का बच्चार बोलेगा।

 

अगर आपको पिछले जन्म में ले जाया गया है और आप याद कर रहे है कि आप एक सिंह है तो अगर उस वक्ते आपको छेड़ दिया जाए तो आप बिलकुल गर्जना कर पड़ेंगे। आप आदमी की तरह नहीं बोलेंगे। हो सकता है आप नाखुन पंजों से हमला बोल दें। अगर आप याद कर रहे है कि आप एक पत्थेर की तरह है और आपसे कुछ पूछा जाए तो आप बिलकुल मौन रह जाएंगे, आप बोल नहीं सकते। आप पत्थऔर की तरह ही रह जाएंगे। हुब्बा र्ड ने हजारों लोगों की सहायता की है। जैसे एक आदमी है जो ठीक से नहीं बोल पाता, हुब्बा र्ड का कहना है कि वह बचपन की किसी स्मृति पर अटक गया है। उसके आगे नहीं बढ़ पाया है। तो वह उसके टाईम ट्रैक पर उसको वापस ले जाएगा। उसके इनग्रेन को तोड़े गा और जब छह वर्ष का हो जाएगा—जहां रूक गई थी, जहां से वह आगे नहीं बढ़ा, फिर जहां वह वापस पहुंच जाएगा....टूट जाएगी धारा। वह आदमी वापस लौट आएगा। तब वह तीस साल का हो जाएगा। वह जो बीच में फासला था चौबीस साल का वह उसको पार कर देगा। और हैरानी की बात है कि हजारों दवाईयां उस आदमी को बोलने में समर्थ नहीं बना पाई थीं लेकिन यह टाईम ट्रैक पर लौटकर जाना और पुन: वापस लौट आना....वह आदमी बोलने में समर्थ हो जाएगा। आप को बहुत दफा जो बीमारियां आती है। वह केवल टाईम ट्रैक की वजह से आती है। बहुत सी बीमारियां है, जैसे दमा। दमा के मरीज की तारीख भी तय रहती है। हर साल ठीक तारीख पर उसका दमा लोट आता है। और इसलिए दमा के लिए कोई चिकित्साक नहीं हो पाती। क्यों कि बीमारी नहीं है,टाईम ट्रैक की बीमारी है, कहीं स्ट्र्क हो गयी, कहीं मैमोरी अटक गयी है और जब फिर वहीं आदमी उस समय को स्मरण कर लेता है—बारह तारीख, बरसा का दिन...उसको बारह तारीख आयी बरसा का दिन आया—वह तैयारी कर रहा है, वह घबरा रहा है कि अब होनेवाला है। आप हैरान होंगे कि इस बार उसको जो दमा होगा—‘’ही इज़ री-ली विंग’’—वह दमा नहीं है। वह सिर्फ पिछले साल की बारह तारीख को री लीव कर रहा है। मगर अब उसका आप इलाज करेंगे। आप उसको झंझट में डाल रहे है। उसका इलाज करने से कोई मतलब नहीं है। क्योंककि वह एक साल पहले वाला आदमी अब है ही नहीं जिसका इलाज किया जा सके आप दवाईयाँ बेकार खा रहे है। क्यों कि दवाएं उस आदमी में जा रही है। जो अभी है और बीमार वह आदमी है जो एक साल पहले था। इन दोनों के बीच कोई तारतम्यद नहीं है, कोई संबंध नहीं है। आपकी हर दवा की असफलता, उसके दमा को मजबूत कर जाएगी। और कह जाएगी कि कुछ नहीं होने वाला है। वह अगले साल की तैयारी फिर कर रहा है। सौ में से सत्त र बीमारियां टाईम ट्रैक पर आधारित है। घटित हो रही है, पकड़ी गई है। जो पीछे लोट कर ले जाती है। हम लोट-लोट कर जी लेते है। ज्योेतिष सिर्फ नक्षत्रों का अध्य यन नहीं हे। वह तो है ही वह तो हम बात करेंगे—साथ ही ज्योेतिष और अलग-अलग आयामों से मनुष्य के भविष्यह को टटोलने की चेष्टाह है कि वह भविष्ये कैसे पकड़ा जा सके। उसे पकड़ने के लिए अतीत को पकड़ना जरूरी है। उसे पकड़ने के लिए अतीत के जो चिन्हक है, आपके शरीर पर और आपके मन पर भी छुट गये है। उन्हें पहचानना जरूरी हे। और जब से ज्यो तिषी शरीर के चिन्होंग पर बहुत अटक गए है तब से ज्योनतिष की गिराई खो गई है, क्यों कि शरीर के चिन्हय बहुत उपरी है। आपके हाथ की रेखा तो आपके मन के बदलने से इसी वक्तय भी बदल सकती हे। आपके आयु की जो रेखा है, अगर आपको भरोसा दिलवा दिया जाए हिप्रोटाइज करके की आप पन्द्रतह दिन बाद मर जाएंगे और आपको रोज बेहोश करके पन्द्राह दिन तक यह भरोसा पक्काक बिठा दिया जाए की आप पन्द्रआह दिन बाद मर जाओगे, आप चाहे मरो या न मरो,आपके उम्र की रेखा पन्द्राह दिन के समय पहुंचकर टूट जाएगी। आपकी अम्र की रेखा में गैप आ जाएगा। शरीर स्वी्कार कर लेता है कि ठीक है, मौत आती है। शरीर पा जो रेखाएं है वह तो बहुत ऊपरी घटनाएं है। भीतर गहरे में मन है और जिस मन को आप जानते है वही गहरे में नहीं है। वह तो बहुत ऊपर है बहुत गहरे तो वह मन है जिसका आपको पता नहीं है। इस शरीर में भी गहरे में जो चक्र है,जिनको योग चक्र कहते है, वह चक्र आपकी जन्मों -जन्मोंर की संपदा की संग्रहीत रूप है। आपके चक्र पर हाथ रखकर जो जानता है वह जान सकता है कि कितनी गति है उस चक्र की। आपके सातों चक्रों को छूकर जाना जा सकता है कि आपने कुछ अनुभव किए है कभी या नहीं। मैं सैकड़ों लोगों के चक्रों पर प्रयोग किया हे। तो मैं हैरान हुआ कि एकाध या ज्यापदा से ज्या दा दो चक्रों के सिवाय,आमतौर से तीसरा चक्र शुरू ही नहीं होता, उसने गति ही नहीं की है कभी, वह बन्द ही पडा है। उसका कभी आपने उपयोग ही नहीं किया। तो वह आपका अतीत है। उसे जानकर अगर एक आदमी मेरे पास आए और मैं देखू कि उसके सातों चक्र चल रहे है तो उससे कहा जा सकता है कि यह तुम्हाेरा अंतिम जीवन है, अगला जीवन नहीं होगा। क्योंतकि सात चक्र चल गए हों तो अगले जीवन का अब कोई उपाय नहीं है। इस जीवन में निर्वाण हो जाएगा, मुक्तिअ हो जाएगी। महावीर के पास कोई आता तो वे फिक्र करते इस बात की कि उस आदमी के कितने चक्र चल रहे है। उसके साथ कितनी मेहनत करनी उचित है, क्या हो सकेगा उसके साथ, मेहनत करने का कोई परिणाम होगा या नहीं होगा। यहाँ कब हो पाएगा? या कितने जन्मस लगेंगे, भविष्य को टटोलने की चेष्टाक है ज्योनतिष—अनेक-अनेक मार्गों से। उनमें एक मार्ग जो सर्वाधिक प्रचलित हुआ,वह ग्रह नक्षत्रों का प्रभाव मनुष्यस के ऊपर—उसके लिए वैज्ञानिक आधार रोज-रोज मिलते चले जाते है। इतना तय हो गया है कि जीवन प्रभावित है। और जीवन अप्रभावित नहीं हो सकता है। दूसरी बात ही कठिनाई की रह गयी—क्या व्यवक्तिजगत रूप से? क्या् एक-एक व्य क्ति भी प्रभावित है। यह जरा चिन्ताठ वैज्ञानिकों को लगती है कि एक-एक व्यीक्तिर—तीन अरब, साढ़े तीन अरब, चार अरब आदमी है जमीन पर है। क्यात एक-एक आदमी अगल-अलग ढंग से..., लेकिन उनको कहना चाहिए यह इतनी परेशानी की बात क्याम है। अगर प्रकृति एक-एक आदमी को अलग-अलग ढंग का अंगूठा दे सकती है। इंडीवहजुअल और पुनरूक्तिअ नहीं करती है—इतनी बारीकी से हिसाब रख सकती है प्रकृति कि एक-एक आदमी को जो अंगूठा देती है वह इंडीवीजुअल, उसकी छाप किसी दूसरे आदमी की छाप फिर कभी नहीं होती। अभी ही नहीं कभी नहीं होती। जमीन पर अरबों आदमी रहे है और अरबों आदमी रहेंगे लेकिन मेरे अंगूठे की जो छाप है वह दोबारा फिर नहीं होगी। आप हैरान होंगे, मैंने एक अंडे के दो जुड़ाव बच्चोंब की बात कही। उनके भी अंगूठे एक जैसे नहीं होते। उनके भी दोनों अँगूठों का छाप अलग होती है। अगर प्रकृति एक-एक आदमी को इतना व्य क्तिेत्वँ दे पाती है। अंगूठे जैसी बेकार चीज को हम सबको, जो बेकार ही है, कुछ खास प्रयोजन का नहीं मालूम पड़ता उसको इतनी विशिष्ट ता दे पाती है तो एक-एक व्यीक्तिो को आत्माो और जीवन विशिष्टन न दे पाए, कोई कारण नहीं मालूम होता। पर विज्ञान बहुत धीमी गति से चलता है और ठीक है,वैज्ञानिक होने के लिए उतनी धीमी गति ठीक है। जब तक तथ्य पूरी तरह सिद्ध न हो जाएं तब तक इंच भी आगे सरकना उचित नहीं है। प्रोफट्स, पैगंबर तो छलाँगें भर लेते है। वह हजारों, लाखों साल बाद तो तय होगी उसकी कह देते है। विज्ञान तो एक-एक इंच सरकता है। अब प्राइमरी स्कू।ल के बच्चे में जो बात आ सके—वहीं बात, वह बात नहीं जो कि प्रोफट्स और विज़नरीज़—सपने देखन वाले लोग जो दूर-दूर की चीजें देख लेते है उनकी समझ में आ सकें—उतनी बात,नहीं, उससे विज्ञान का उतना प्रयोजन नहीं है। तथ्य –प्रयोगित तथ्य पर ही उसकी दृष्टि है। सपने देखने की उसे सुविधा नहीं हे। पर पैगम्बहर तो सपनों में भी सत्यत को खोल लेते है। उनके लिए तो भविष्यप भी वर्तमान का ही फैलाव है।

 

ज्योतिष मूलत: चूंकि भविष्य की तलाश है। और विज्ञान चूंकि मूलत: अतीत की तलाश है—विज्ञान इसी बात की खोज है कि काज क्याू है, कारण क्या है ज्योूतिष इसी बात की खोज है कि एफेक्ट क्याा होगा। परिणाम क्या होगा? इन दोनों के बीच बड़ा भेद है। इन दोनों के बीच बड़ा भेद है। लेकिन फिर भी विज्ञान को रोज-रोज अनुभव होता है। कुछ बातें जो अनहोनी लगती थी, लगती थीं—कभी सही नहीं हो सकतीं, वह सही होती हुई मालूम पड़ती है। जैसा मैंने पीछे आपको कहा, अब वैज्ञानिक इसको स्वी कार कर लिए है कि प्रत्येोक व्यचक्तिल अपने जन्मह के साथ बिल्टक-इन अपना व्‍यक्तिीत्व लेकर पैदा होता है। इसको पहले वह मानने को राज़ी नहीं थे। ज्योातिष इसे सदा से कहता रहा है। जैसे समझो, एक बीज है—आम का बीज, आम के बीज के भीतर किसी न किसी रूप में जब हम आम के बीज को वो देंगे तो जो वृक्ष पैदा होता है उसकी बिल्टभ-इन प्रोग्राम होना चाहिए। उसका ब्ल्यू प्रिंट होना चाहिए—नहीं, तो यह आम का बीज बेचारा......न कोई विशेषज्ञों की सलाह लेता हे, न किसी यूनिवर्सिटी में शिक्षा पाता है। यह आम के वृक्ष को कैसे पैदा कर लेता है। फिर इसमें वैसे ही पत्तेउ जाते है, फिर इसमें वैसे ही आम लग जाते है। इस बीज, गुठली के भीतर छिपा हुआ कोई पूरा का पूरा प्रोग्राम चाहिए,नहीं तो बिना प्रोग्राम के यह बीज क्या कर पायेगा। इसके भीतर सब मौजूद चाहिए । जो भी वृक्ष में होगा वह कहीं न कहीं छिपा ही होना चाहिए। हमें दिखाई नहीं पड़ता काट पीट कर हम देख लेते है। कहीं दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन होना तो चाहिए। अन्यडथा आम के बीज से फिर नीम निकल सकती है। भूल-चूक हो सकती है। लेकिन कभी भूल-चूक होती दिखाई नहीं पड़ती। आम ही निकल आता है सब रिपिट हो जाता है फिर वही पुनरुक्त रह जाता है। इस छोटे से बीज में अगर सारी की सारी सूचनाएं छिपी हुई नहीं है कि इस बीज को क्यास करना है , कैसे अंकुरित होना है, कैसे पत्तेु, कैसे शाखाएं, कितना बड़ा वृक्ष, कितनी उम्र का वृक्ष, कितना ऊँचा उठना है। यह सब इस में छिपा होना चाहिए। कितने फल लगेंगे, कितने मीठे होंगे पकें गे कि नहीं पकें गे, यह सब इसके भीतर छिपा होना चाहिए। अगर आम के बीज के भीतर यह सब छिपा है तो आप जब मां के पेट में आते है तो आपके बीज में सब छिपा नहीं होगा। अब वैज्ञानिक स्वीाकार करते है कि आँख का रंग छिपा होगा,बाल का रंग छिपा होगा। शरीर की ऊँचाई छिपी होगी। स्वाास्य्कर -अस्वा स्य् र की सम्भाावनाएं छिपी होगी। बुद्धि का अंक छिपा होगा, क्योंसकि इसके सिवाय कोई उपाय नहीं है कि आप विकसित कैसे होंगे। आपके पास अग्रिम प्रोग्राम चाहिए—कोई हड्डी कैसे हाथ बन जाएगी, कोई हड्डी कैसे पैर बन जाएगी। चमड़ी का एक हिस्सा् आँख बन जाएगा, एक हिस्साग कैसे कान बन जायेगा। एक हड्डी सुनने लगेगी,एक हड्डी देखने लगेगी। ये सब कैसे होगा?

 

वैज्ञानिक पहले कहते थे, सब संयोग है, लेकिन संयोग शब्दा बहुत अवैज्ञानिक मालूम पड़ता हे। संयोग का मतलब है चांस, तो फिर कभी पैर देखने लगे और कभी हाथ सुनने लगे। और इतना संयोग नहीं मालूम पड़ता। इतना व्यरवस्थिनत मालूम पड़ता है...ज्योदतिष ज्यामदा वैज्ञानिक बात कहता है। ज्योातिष कहता है। सब बीज को उपलब्धे है। हम अगर बीज को पढ़ पाये,अगर हम डी-कोड कर पाएँ, अगर हम बीज से पूछ सकें कि तेरे इरादे क्याब हे—तो हम आदमी के बाबत भी पूर्व घोषणाएँ कर सकते है। वृक्ष के बाबत तो वैज्ञानिक घोषणाएँ करने लगें है। बीस साल में आदमी के बाबत बहुत सी घोषणाएँ वे करने लगेंगे। और अब तक हम सब समझते रहे कि सूपरस्टीसटस है ज्योोतिष, एक विश्वामस मात्र हे। लेकिन यदि घोषणाएँ विज्ञान करेगा तो वह ज्यो तिष भी हो जाएगा। और विज्ञान घोषणा करने लगेगा। बहुत पुराने ज्यो।तिषी, ज्योातिष का पुराने से पुराना इजिप्शिऔयन एक ग्रंथ है जिसको पाइथागोरस ने पढ़कर और यूनान में ज्योणतिष को पहुंचाया। यह ग्रंथ कहता है—काश हम सब जान सकें, तो भविष्यो बिलकुल नहीं है। चूंकि हम सब नहीं जानते कुछ ही जानते है—इसलिए जो हम नहीं जानते,वह भविष्य बन जाता है। हमें कहना पड़ता है, शायद ऐसा हो, क्योंहकि बहुत कुछ है जो अनजाने है। अगर सब जाना हुआ हो तो हम कह सकते है कि ऐसा ही होगा। फिर इस में रति भर फर्क नहीं होगा। आदमी के बीज में भी अगर सब छिपा है। आज मैं जो बोल रहा हूं किसी न किसी रूप में मेरे बीज में संभावना होनी चाहिए थी। अन्य था मैं यह कैसे बोलता। अगर किसी दिन सह सम्भारवना हो सकी और हम आदमी के बीज को देख सकें तो मेरे बीज को देखकर मैं क्यास बोल सकूंगा जीवन में उसकी घोषणा की जा सकती हे। और कोई आश्च र्य नहीं है कि हम आज नहीं कल आदमी के बीज में झांकने में समर्थ हो जाएं। जन्मे कुंडली या होरोस्को प उसका ही टटोलना है। हजारों वर्ष से हमारी कोशिश यही है कि जो बच्चा पैदा हो रहा है वह क्या् हो सकता हे। या क्या हो सकेगा? हमें कुछ तो अन्दारज मिल जाए तो हम उसे शायद हम उसे सुविधा दे पाएँ। शायद हम उससे आशाएं बाँध पाएँ। जो होने वाला है, उसके साथ हम राज़ी हो जाएं। मुल्ला नसीरुद्दीन ने अपने जीवन के अन्तए में कहा है कि मैं सदा दुःखी था। फिर एक दिन मैं अचानक सुखी हो गया। गांव भर के लोग चकित हो गए कि जो आदमी सदा दुःखी था और जो आदमी हर चीज का अँधेरा देखता था वह अचानक प्रसन्नि कैसे हो गया। जो हमेशा पोसिमिस्टर था, जो हमेशा देखता था कि कांटे कहां-कहां है। एक बार मुल्लाद नसीरुद्दीन के बग़ीचे में बहुत अच्छी। फसल आ गई। सेब बहुत लगे। ऐसे कि वृक्ष लद गए। पड़ोस में एक आदमी ने पूछा, सोचा उसने कि आब तो नसीरुद्दीन कोई शिकायत न कर सकेगा। कहां कि इस बार तो फसल ऐसी है कि सोना बरस जायेगा, क्याद नसीरुद्दीन ने बड़ी उदासी से कहा: और सब तो ठीक है लेकिन जानवरों को खिलाने के लिए सड़े सेब कहां से लाएँगें? उदास बैठा है वह, जानवरों को खिलाने के लिए सड़े सेब कहां से लाओ गे, सब सेब अच्छे है कोई सड़ा हुआ ही नही,ये भी एक मुसीबत। वह आदमी एक दिन अचानक प्रसन्नै हो गया तो गांव के लोगों को हैरानी हुई तो गांव के लोगों ने पूछा कि तुम और प्रसन्नक–नसीरुद्दीन, क्या राज है इसका नसीरुद्दीन ने कहां आई हेवँ लर्न्टन टु कोआपरेटिव विद दी इनइवीटेबल। वह जो अनिवार्य है मैं उसके साथ सहयोग करना सीख गया हूं। बहुत दिन लड़कर देख लिया। अब मैंने यह तय कर लिया है कि जो होना है, होना है। अब मैं सहयोग करता हूं। इनइवीटेबल के साथ—जो अनिवार्य है उसके साथ सहयोग करता हूं। अब दुःख को कोई कारण न रहा। अंग मैं सुखी हूं।

 

ज्योतिष बहुत बातों की खोज थी। उसमें जो अनिवार्य है, उसके साथ सहयोग—वह जो होने ही वाला है, उसके साथ व्यार्थ का संघर्ष नहीं, जो नहीं होने वाला है उसकी व्य र्थ की मांग नहीं, उसकी आकांशा नहीं, ज्योसतिष मनुष्य को धार्मिक बनाने के लिए, तथाता में ले जाने के लिए, परम स्वींकार में ले जाने के लिए उपाय था। उसके बहु आयाम है। हम धीरे-धीरे एक-एक आयाम पर बात करेंगे। आज तो इतनी बात, कि जगत एक जीवंत शरीर है, आर्गैनिक यूनिटी है—उसमें कुछ भी अलग-अलग नहीं है—सब संयुक्तत है। दुर से दूर जो है वह भी निकट से निकट जुड़ा है-- इसलिए कोई इस भ्रांति में न रहे कि वह आईसोलेटेड आइलैंड है। कोई इस भ्रांति में न रहे कि कोई एक द्वीप है छोटा सा—अलग-थलग। नहीं कोई अलग-थलग नहीं है सब संयुक्त है और हम पूरे समय एक दूसरे को प्रभावती कर रहे है। और एक दूसरे से प्रभावित हो रहे है। सड़क पर पडा हुआ पत्थरर भी, जब आप उसके पास से गुजरते है तो आपकी तरफ किरणें फेंक रहा है। फूल भी फेंक रहा है, और आप भी ऐसे नहीं गुजर रहे है, आप भी अपनी किरणें फेंक रहे है। मैंने कहा कि चाँद-तारों से हम प्रभावित होते है। ज्यो तिष का और दूसरा ख्यातल है कि चाँद-तारे भी हमारे प्रभावित होत है, क्यों्कि प्रभाव कभी भी एक तरफा नहीं होता। जब कभी बुद्ध जैसा आदमी जमीन पर पैदा होता है तो चाँद यह न सोचे कि चाँद पर उनकी वजह से कोई तूफान नहीं उठते। बुद्ध की वजह से कोई तूफान चाँद पर शांत नहीं होते। अगर सूरज पर धब्बेू आते है और तूफान उठते है। तो जमीन पर बीमारियां फैल जाती है। तो जमीन पर जब बुद्ध जैसे व्यक्ति पैदा होते है। और शांति की धारा बहती है। और ध्याान का गहन रूप पृथ्वीह पर पैदा होता है। तो सूरज पर भी तूफान फैलने में कठिनाई होती है—सब संयुक्त है। एक छोटा सा घास का तिनका भी सूरज को प्रभावित करता है। और सूरज भी घास के तिनके को प्रभावित करता हे। न तो घास का तिनका इतना छोटा है कि सूरज कहे कि जा हम तेरी फ्रिक नहीं करते। और न सूरज इतना बड़ा है कि यह कह सके कि घास का तिनका मेरे लिए क्याि कर सकता हे। जीवन संयुक्तै है। यहां छोटा-बड़ा कोई भी नहीं है। एक आर्गैनिक यूनिटी है—इस एकात्म का बोध अगर ख्या ल में आए तो ही ज्योकतिष समझ में आ सकता है। अन्यैथा ज्योकतिष समझ में नहीं आ सकता हे। इस पर मैंने यह आज बात कही, कल आयामों पर हम धीरे-धीरे बातें करेंगे।

 

 

हमारा उद्देश्य यहां ज्योतिष के कोइ भी मत का खंडन या पुष्टि करना कतई नहीं है पाठक अपने विवेक के अनुसार सहमत या असहमत हो सकते है